तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Tuesday, 8 May 2012

किनारा कर रहे हैं.....स्व. कृष्णानन्द चौबे जी

आदाब ! स्व. कृष्णानन्द चौबे जी की ग़ज़ल देखें यदि अच्छी लगे तो प्रतिक्रिया अवश्य दें इससे उनकी आत्मा को सकूंन भी मिलेगा और दोस्ती का तक़ाज़ा भी यही कहता है :-
.................:: ग़ज़ल ::......................

किनारा कर रहे हैं अपने बेगाने सभी मुझसे

नहीं अब पूछता है कोई भी राज़ी-खुशी मुझसे

मुझे लगता है मेरी प्यास हद से बढ़ गयी वरना

नदी का ज़िक्र क्यों करती है अक्सर तश्नगी मुझसे

भला इस हाल में पहचान क्या होती उजाले की

कभी मैं रौशनी से दूर था अब रौशनी मुझसे

परेशां हूँ ये सुनकर आशियाँ पर गिर गयी बिजली

खुदा के वास्ते कुछ और मत कहना अभी मुझसे

उसी का ज़िक्र करती है, उसी का नाम लेती है

न जाने क्या कराना चाहती है बेखुदी मुझसे


-----स्व. कृष्णानन्द चौबे जी
प्रस्तुतिकरणः ज़नाब अन्सार काम्बरी

4 comments:

  1. वाह..................

    बेहतरीन गज़ल...
    सांझा करने का शुक्रिया यशोदा जी.

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  2. बेहद खूबसूरत ग़ज़ल.. सारे ही शेर गजब। लेकिन मेरी व्यक्तिगत पसंद -
    भला इस हाल में पहचान क्या होती उजाले की
    कभी मैं रौशनी से दूर था अब रौशनी मुझसे

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    1. शुक्रिया दीपिका जी

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  3. यशोदा अग्रवाल जी
    नमस्कार !

    आपने इतनी बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने का आवसर दिया , इसके लिए आभार !
    ज़नाब अन्सार काम्बरी जी का भी शुक्रिया
    स्व. कृष्णानन्द चौबे जी की ग़ज़ल के प्रस्तुतिकरण के लिए …

    पूरी ग़ज़ल शानदार है …
    परमात्मा स्वर्गीय चौबे जी की आत्मा को चिर शांति प्रदान करे…


    मंगलकामनाओं सहित…
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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