तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Wednesday, 12 December 2012

नज़्म 'बलूग़त'...................अब्दुल अहद साज़



मेरी नज़्म
मुझसे बहुत छोटी थी
खेलती रहती थी पेहरों आग़ोश में मेरी
आधे अधूरे मिसरे मेरे गले में बाँहें डाले झूलते रहते

ज़ेहन के गेहवारे में हमकते,
दिल के फ़र्श पर रोते मचलते,
नोक-ए-क़लम पर शोर मचाते, ज़िद करते,
माअनी की तितलियों के पीछे दौड़ते फिरते थे अल्फ़ाज़

मेरी नज़्म
मुझसे बहुत छोटी थी
जाने समय कब बीत गया
गुड़ियों के पर निकले और वो परियों से आज़ाद हुईं
लफ़्ज़ जवाँ होकर इज़हार की रेह चल निकले

और मैं--------तन्हा,
अपनी पराई आँखों से ये देख रहा हूँ,
मेरी उंगली थाम के चलने वाली नज़्म
अब अपने पैरों पे खड़ी है

मेरी नज़्म
मुझ से बड़ी है 

शायर : अब्दुल अहद साज़

3 comments:

  1. naye andaj me ek behatareen prastuti**** और मैं--------तन्हा,
    अपनी पराई आँखों से ये देख रहा हूँ,
    मेरी उंगली थाम के चलने वाली नज़्म
    अब अपने पैरों पे खड़ी है

    मेरी नज़्म
    मुझ से बड़ी है

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