तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Thursday, 13 December 2012

अर्जी छुट्टी की..........संतोष सुपेकर










छुट्टी की अर्जी,
केवल एक कागज
या दस्तावेज
ही नहीं....

एक भावना है..
एक आशा है
उम्मीद है...और
हक भी है

एक धमकी है..
बहाना है.... और
सपना भी है

सपना, जो टूटता भी है कभी
जब होती है खारिज अर्जी
और लिखा मिलता है उसपर
अस्वीकृत..

मुस्कुराते हुए बॉस की मर्जी

और...एक और छुट्टी की अर्जी
जो हरदम स्वीकृत ही होती है
इस घोर कलियुग में भी
मानवतता यहाँ नही सोती है

वह अर्जी है...
माँ की बीमारी की वजह से
माँगी गई छुट्टी
अक्सर उस 'बीमार' माँ के लिये
जो मर चुकी है,
कई वर्ष पूर्व गाँव मे..

--संतोष सुपेकर
--संपादनः यशोदा अग्रवाल

Wednesday, 12 December 2012

नज़्म 'बलूग़त'...................अब्दुल अहद साज़



मेरी नज़्म
मुझसे बहुत छोटी थी
खेलती रहती थी पेहरों आग़ोश में मेरी
आधे अधूरे मिसरे मेरे गले में बाँहें डाले झूलते रहते

ज़ेहन के गेहवारे में हमकते,
दिल के फ़र्श पर रोते मचलते,
नोक-ए-क़लम पर शोर मचाते, ज़िद करते,
माअनी की तितलियों के पीछे दौड़ते फिरते थे अल्फ़ाज़

मेरी नज़्म
मुझसे बहुत छोटी थी
जाने समय कब बीत गया
गुड़ियों के पर निकले और वो परियों से आज़ाद हुईं
लफ़्ज़ जवाँ होकर इज़हार की रेह चल निकले

और मैं--------तन्हा,
अपनी पराई आँखों से ये देख रहा हूँ,
मेरी उंगली थाम के चलने वाली नज़्म
अब अपने पैरों पे खड़ी है

मेरी नज़्म
मुझ से बड़ी है 

शायर : अब्दुल अहद साज़

झुक के हम मिलते हैं बेशक ............अन्सार कम्बरी


वक़्त है ऐसा परिंदा लौट कर आता नहीं,
जो गुज़र लाता है लम्हा खुद को दोहराता नहीं !

झुक के हम मिलते हैं बेशक गिर के हम मिलते नहीं,
जी हमारा दिल अना को ठेस पहुंचाता नहीं !

साफ-सुथरी ज़िन्दगी में बाल न पड़ता अगर,
आईना दिल का तेरी आँखों से टकराता नहीं !

दोस्तों की महफ़िलें हों चाहे हों तन्हाईयाँ,
आपको देखा है जब से कुछ हमें भाता नहीं !

'क़म्बरी' सच्चाई पर चलना तो मुश्किल है मगर,
जो भटक जाता है राहें मंजिलें पाता नहीं !


---अन्सार कम्बरी

बांसुरी-सी बज रही है सुन जरा............ओम प्रभाकर

तू अभी से सो रही है, सुन जरा
रातरानी महकती है सुन जरा।

सुन जरा मेरे लबों की तिश्नगी
तिश्नगी भी चीखती है सुन जरा।

 
कुछ दिनों से क्यूं हमारे दरम्यां
बांसुरी-सी बज रही है सुन जरा।

 
हदे-शोरो-गुल ये मेरी खामुशी
बेनवा कुछ कह रही है सुन जरा।

 
हां, अभी भी गोशा-ए-दिल में कहीं
एक नागिन रेंगती है, सुन जरा।


--ओम प्रभाकर