Wednesday, 27 December 2017

ना जाने कितने मौसम बदलेंगे.....


ना जाने कितने मौसम बदलेंगे
ना जाने
कितने लोगों से
कितनी
मुलाकातें बची है?
न जाने कितने दिन
कितनी रातें बची हैं?
ना जाने कितना रोना
कितना सहना बचा है?
कब बंद हो जायेंगी आँखें
किस को पता है?

कितने फूल खिलेंगे?
कब उजड़ेगा बागीचा
किस को पता है?
ना जाने कितनी सौगातें
मिलेंगी?
बहलायेंगी या रुलायेंगी
किस को पता है?
जब तक जी रहा
क्यों फ़िक्र करता निरंतर
ना तो परवाह कर
ना तू सोच इतना
जब जो होना है हो
जाएगा
जो मिलना है मिल
जाएगा
तू तो हँसते जा गाते जा
निरंतर
जो भी मिले
उससे गले लग कर
मिल निरंतर...!!
-यशोदा
मन की उपज

16 comments:

  1. बहुत सुंदर...
    मेरी तरफ से शुभकामनाएं

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  2. सम्हाले अपनी 'धरोहर '
    कल्पित गंतव्य को
    अभौतिक भवितव्य को
    तू बढ़ते जा
    तू हंसते जा...!!!!
    बहुत सुंदर दर्शन। बधाई और आभार!!!

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  3. हम अंजान डगर के राही हैं
    गंतव्य हमारा है अनिश्चित
    जीवन पथ के हम
    अनभिज्ञ मुसाफिर,
    नियती लिए बैठी सौगातें
    या फिर कोई घातें
    ना हम जाने ना पहचाने
    हर राह ही है अजनबी
    आज बाग खिला फूलों का
    कल उपवन मुरझाया
    हवा लिये उडती है सौरभ
    कल जैसे पतझर छाया।

    दी बहुत बहुत सुंदर आध्यात्मिक पुट लिये अप्रतिम रचना।

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  4. आप की रचना को शुक्रवार 29 दिसम्बर 2017 को लिंक की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. कितने फूल खिलेंगे?
    कब उजड़ेगा बागीचा
    किस को पता है?
    ना जाने कितनी सौगातें
    मिलेंगी?
    बहुत सुन्दर....
    सही कहा जो होना है हो जायेगा
    जिसको मिलना है मिल जायेगा
    वाह!!!!
    दार्शनिक भाव लिए लाजवाब रचना....

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  6. भविष्य को कौन जानता है ! खूबसूरत प्रस्तुति ! बहुत खूब आदरणीया ।

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  7. गीता का सा उपदेश दे रही
    ज्ञान भरी सी कविता
    जब तक जीना तब तक सीना
    नाहक फिक्र काहे करता !

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  8. यशोदा जी, आपने तो सीधी, सरल भाषा में गीता का उपदेश दे दिया. पता नहीं क्यों हम वर्तमान और भविष्य को लेकर इतने आशंकित और इतने सहमे हुए क्यों रहते हैं? इन्सान के अलावा कोई भी प्राणी भविष्य की चिंता कर अपना चैन नहीं खोता है. मस्ती, बेफ़िक्री और ज़िन्दादिली के साथ जियेंगे तो दुश्मन भी दोस्त बन जायेंगे.

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  9. जब जो होना है हो
    जाएगा
    जो मिलना है मिल
    जाएगा
    तू तो हँसते जा गाते जा
    निरंतर
    जो भी मिले
    उससे गले लग कर
    मिल निरंतर...!!--
    बहुत खूब आदरनीय दीदी -- बहुत हे सार्थक रचना | बधाई -----

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  10. जीवन में आशाओं और निराशाओं की कशमकश से निकलकर अंत में रचना दिशा भी दिखाती है। यही निखार है सर्वोत्तम सृजन का।
    फ़लसफ़ा जो विकसित हुआ है कि हर पल जियो जिंदगी का...... मुकम्मल संदेश है।
    लाजवाब है मन की उपज की प्रस्तुति।
    बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  11. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/01/50.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  12. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/01/50.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  13. आपकी ये कविता मुझे जिंदगी को हल्के मन से जीने की याद दिलाती है। आपने इतने सीधे सवाल पूछे कि मैं खुद रुककर सोचने लगा। सच में, हम नहीं जानते कितने दिन, कितनी रातें हमारे हिस्से में हैं। फिर भी हम बेवजह चिंता में समय गंवा देते हैं।

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