तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Saturday, 12 November 2011

कितना चाहते है मुझे लोग .....मोहन बंजारा

मैं मोहब्बत गर करता हूँ तुमसे ,
इस बात पर क्यूँ अक्सर जल जाते हैं लोग

कोशिशें लाख करें बच नहीं पाते हैं लोग ,
हुस्न की आग से अक्सर पिघल जाते हैं लोग

 हर कोई चाहता है मोहब्बत में जीना ,
जाने क्यूँ फिर वफ़ा निभाना भूल जाते हैं लोग,

दर्द के लम्हात गर कभी पेश-ए-नज़र होते ज़माने वालों को,
जान जाते ये वो भी कि कैसे टूट कर बिखर जाते हैं लोग

तन्हाइयों में जीना मेरी आदत सी बन गयी है,
क्यूँ तन्हा करके मुझे अब कसमसाते हैं लोग

खुशियाँ जो हमसफ़र थी कभी ,ज़माने को बुरी लगती थी,
ग़म का भी गर सहारा है मुझे तो फिर भी आज तिलमिलाते हैं लोग

जाने क्या समझता है ये ज़माना  इस 'बंजारे ' को
छीन कर खुशियाँ मेरी ,ग़म मेरे नाम कर जाते हैं लोग..... बंजारा

अगर हो सके तो .......................अज्ञात

अज्ञात कवि की इस रचना को मेरी मित्र सोनू अग्रवाल ने फेसबुक में पोस्ट किया.............
अगर हो सके तो ...

मुझे अपनी आँखों मैं रखना ,,,

आँसु बन कर बह जाऊ तो ,

हाथो मैं छुपा लेना..!!

अगर हो सके तो ...

मुझे हवाओ मैं बिखेर देना ,,,

तुम्हे छू कर चला जाऊ तो ,

मुझे महसूस कर लेना..!!

अगर हो सके तो ...

मुझे एक फूल समझ लेना,,,

मुरझा भी जाऊ तो ,

किताबो मैं रख लेना..!!

अगर हो सके तो ...

मुझे अपनी खुवाहिश समझ लेना,,

अगर कभी जो मिल न पाऊ तो ,

मुझे अपनी दुआओ मैं रख लेना... !!!

Thursday, 10 November 2011

आँख उनसे मिली.......................डॉ.(श्रीमती) तारा सिंह

आँख उनसे मिली तो सजल हो गई
प्यार बढ़ने लगा तो ग़ज़ल हो गई

रोज़ कहते हैं आऊँगा आते नहीं
उनके आने की सुनके विकल हो गई

ख़्वाब में वो जब मेरे करीब आ गये
ख़्वाब में छू लिया तो कँवल हो गई

फिर मोहब्बत की तोहमत मुझ पै लगी
मुझको ऐसा लगा बेदख़ल हो गई

वक्त का आईना है लबों के सिफ़र
लब पै मैं आई तो गंगाजल हो गई

'तारा' की शाइरी किसी का दिल हो गई
ख़ुशबुओं से तर हर्फ़ फ़सल हो गई 

---डॉ.(श्रीमती) तारा सिंह

रूहानी आँखे.................~अमि 'अज़ीम '

आप की अपनी कहानी आँखे
है महोब्बत की जुबानी आँखे

इन खिजां राहों पे भी रौशन है
वो जुगनुओ सी रूहानी आँखे

भीगी नजरों में आपका चहरा
इक झलक की है दिवानी आँखे

पलकें बोझिल , ख्वाब काँटों से
है दर्दे-दिल की निशानी आँखे

मत करो प्यार उलझ जाओगे
सच ही कहती है सियानी आँखे
~अमि 'अज़ीम '

Wednesday, 9 November 2011

इंतजार की घड़ी................सी. आर. राजश्री

भुलाये नहीं जाते वो पल,
संग तुम्हारे थे जब हम कल।
प्यार से भरा स्पर्श का वो लम्हा,
सताते है जब रहते है हम तन्हा।

याद तुम आते हो बहुत मुझे
पर कौन अब ये बतायेगा तुझे?
महसूस करती हूँ तुम्हारी कमी,
शायद तुम अब आ जाते कहीं।

संजोयी है मैंने, कुछ हसीन यादें,
खाये थे जब हमने, जीने मरने की वादे।
छेड़ने, रूठने, मनाने का वो सिलसिला,
रूलाती है मुझे, भरती है मन में गिला।

अब और न तड़पाओ, चले आओ,
इन आँखों को न तरसाओ, लौट आओ।
थक गई हूँ, तुम्हारी राह निहारती,
भर लो बाँहो में साजन, मिटा दो इंतजार की घड़ी।
-----सी.आर.राजश्री

Tuesday, 8 November 2011

नजर अपनी अपनी,,,,,,,,,,,,,,,,,,पाराशर गौड़

एक बच्चे की
आँख की रोशनी पल पल जाती रही
कम होती गई
माँ-बाप को हुई चिंता
इसका का क्या होगा ?
गर---इसकी रोशनी चली गई ।
बाप बोला .. .. .. ..
एक काम करें
इसकी आँखों की रोशनी कम होने पहले
क्यों ना, अखबारों में
इशतहार दें ...
"एक बच्चे को आँखें चाहिए
उसे अन्धा होने से बचाएँ ... "
कुछ दिनों के बाद
टेलीफोन खड़के, आवाज आई
मुबारक हो..
आपके बच्चे को आँखें मिल गईं ।
माँ-बाप ने दी दुआ ..
आप्रेशन हुआ
पट्टी खुली, माँ बोली .. ..
"बेटा, कुछ दिखाई दे रहा है
वो, बोला ---- "हाँ"
ये सुनकर सब की बाँछे खिलीं
आवाज आई...
"शुक्र है खुदा का और उसका भी,
जिसकी आँखें इसे मिलीं।"
वो उठा ----,
सब को वहीं छोड़
सामने कुर्सी की ओर दौड़ा
धम्म से जा धस्सा ..
बैठा उसमें होकर चौड़ा
सब एक दूसरे को देखते रहे
इशारों से पूछते रहे ---
ये ऐसा क्यों कर रहा है
ये क्या हो रहा है।
तभी किसने कहा ..,
इसमे इसका कोई दोष नहीं
ये बात, आपकी समझ में नहीं आयेगी
दरसल, इसको जो आँखें मिली हैं, वो
वो, किसी नेता की हैं
वो आप लोगों को थोड़ी देखेंगी
वो -- तो.. .. कुर्सी को देखेंगी।

,,,,,,,,,,,,,पाराशर गौड़

Monday, 7 November 2011

इन्तज़ार रहता है............अशोक वशिष्ट

मुझे मौत का, मौत को मेरा, इन्तज़ार रहता है,
साहब से कब मिलना होगा, इन्तज़ार रहता है?

जीवन भोगा, इस जीवन का, हर सुखदुख भी भोगा,
अब उस दुनियां के सुखदुख का, इन्तज़ार रहता है।

सोचता हूँ कि इकदिन, उस दुनियां का सच जानूँगा,
जाने क्यों उस दिन, उस पल का, इन्तज़ार रहता है?

मानव की किस्मत में जाने, कितना सफ़र लिखा है?
इसको कब जानूँ कब समझूँगा, इन्तज़ार रहता है?

उससे बिछड़के जीना कितना, मुश्किल हो जाता है!
फिर जीना आसां कब होगा , इन्तज़ार रहता है?

लोग न जाने क्यों मरने से, डरते ही रहते हैं?
मरके मंज़िल को पा जाऊँगा, इन्तज़ार रहता है।
--------अशोक वशिष्ट