तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Saturday, 31 March 2012

छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम.........अधीर


यहॉ कब कौन किसका हुआ है ,
इंसान जरुरत से बंधा हुआ है ।

मेरे ख्वाबो मे ही आते है बस वो,
पाना उसको सपना बना हुआ है।

सुनो,पत्थर दिलो की बस्ती है ये,
तु क्यो मोम सा बना हुआ है ।

खुदगर्ज है लोग इस दुनिया मे,
कौन किसका सहारा हुआ है ।

कहने को तो बस अपना ही है वो,
दिलासा शब्दो का बना हुआ है ।

लोहा होता तो पिघलता शायद,
इंसान पत्थर का बना हुआ है।

जीत ने का ख्वाब देखा नही कभी,
हारने का बहाना एक बना हुआ है ।

नही होता अब यकीन किसी पर भी,
इंसान तो जैसे हवा बना हुआ है।

लगाके गले वो परायो को शायद,
अंजान अपनो से ही बना हुआ है।

छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम,
ठोकर खाकर "अधीर" संभला हुआ है । 
-अधीर 
प्रस्तुतिकरणः सुरेश पसारी

फूल हों तेरी राह में है मेरी बस दुआ.....रिकी मेहरा

जिन्हें याद करते हैं हम बस यूँ ही सदा
उन्हें मेरी भी चाहत हो ज़रूरी तो नहीं

फ़लसफ़ा मेरी मोहब्बत का मशहूर हो जहाँ

उस महफ़िल में मेरा नाम आए ज़रूरी तो नहीं

सिर्फ़ फूल हों तेरी राह में है मेरी बस दुआ
एक सी हम दोनों की फ़रियाद हो ज़रूरी तो नहीं

तमन्ना दिल में मेरे कई ख़्वाब जगा देती है
मगर किस्मत भी साथ मेरे दे ज़रूरी तो नहीं

मुस्कुरा के भी होते हैं बयाँ हाल इस दिल के
मुझ को रोने की भी आदत हो ज़रूरी तो नहीं
---रिकी मेहरा

Tuesday, 20 March 2012

मैं तो चाँद हूँ तन्हा ही रहा..........हेमज्योत्सना 'दीप'

चेहरे बदलने का हुनर मुझमें नहीं,
दर्द दिल में हो तो हँसने का हुनर मुझमें नहीं,


मैं तो आईना हूँ तुझसे, तुझ जैसी ही बात करूँ,
टूट कर सँवरने का हुनर मुझमें नहीं।

चलते-चलते थम जाने का हुनर मुझमें नहीं,
एक बार मिल कर छोड़ जाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो दरिया हूँ, बहता ही रहा,
तूफान से डर जाने का हुनर मुझमें नहीं।

सरहदों में बँट जाने का हुनर मुझमें नहीं,
रोशनी में ना दिख पाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो हवा हूँ महकती ही रही,
आशियाने में रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

दर्द सुनकर और सताने का हुनर मुझमें नहीं,
धर्म के नाम पर खून बहाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो इन्सान हूँ, इन्सान ही रहूँ,
सब कुछ भूल जाने का हुनर मुझमें नहीं।

अपने दम पे जगमगाने का हुनर मुझमें नहीं,
मैं तो रात को ही दिखूँगा,
दिन में दिख पाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो चाँद हूँ तन्हा ही रहा,
तारों की तरह साथ रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

मैं तो जिन्दगी हूँ चलती ही रहूँ,
बेवक्त साथ छोड़ जाने का हुनर मुझमें नहीं।

मैं एक एहसास हूँ, मन में ही बसूँ,
भगवान की तरह पत्थर में रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

-----------हेमज्योत्सना 'दीप'

Saturday, 17 March 2012

मेरे जाने के बाद.............................स्मृति जोशी ''फाल्गुनी''

कुछ मत कहना तुम
मैं जानती हूँ
मेरे जाने के बाद
वह जो तुम्हारी पलकों की कोर पर
रुका हुआ है
चमकीला मोती
टूटकर बिखर जाएगा
गालों पर
और तुम घंटों अपनी खिड़की से
दूर आकाश को निहारोगे
समेटना चाहोगे
पानी के पारदर्शी मोती को,
देर तक बसी रहेगी
तुम्हारी आँखों में
मेरी परेशान छवि
और फिर लिखोगे तुम कोई कविता
फाड़कर फेंक देने के लिए...
जब फेंकोगे उस
उस लिखी-अनलिखी
कविता की पुर्जियाँ,
तब नहीं गिरेगी वह
ऊपर से नीचे जमीन पर
बल्कि गिरेगी
तुम्हारी मन-धरा पर
बनकर काँच की कि‍र्चियाँ...
चुभेगी देर तक तुम्हें
लॉन के गुलमोहर की नर्म पत्तियाँ।
----स्मृति जोशी ''फाल्गुनी''

Thursday, 8 March 2012

अगोरती है आत्मा अगोरती है.............रंजना जायसवाल

प्रेम करना
ईमानदार हो जाना है
यथार्थ से स्वप्न तक ..समष्टि तक
फैल जाना है
त्रिकाल तक
विलीन कर लेना है
त्रिकाल को भी ..प्रेम में.. अपने
जी लेना है अपने
प्रेमालाम्ब में सारी कायनात को पहली बार
प्रेम करना
देखना है खुद को
खोजना है
खुद से
बाहर
मन को छूता है कोई
पहली बार
बज उठती है देह की वीणा
सजग हो उठता है मन –प्राण
चीजों के चर –अचर जीव के ..जन के
मन के करुण स्नेहिल तल तक
छूता है कोई जब पहली बार
सुंदर हो जाती है
हर चीज
आत्मा तक भर उठती है
सुंदरता
अगोरती है आत्मा अगोरती है
देह
देखे कोई नजर
हर पल हमें .
----रंजना जायसवाल

Friday, 2 March 2012

महक उठी थी केसर..........................फाल्गुनी

खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,
महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,
और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,
मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,
तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,
मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।
---------फाल्गुनी

यादों की किरचें ..................................फाल्गुनी

दिल की कोमल धरा पर
धँसी हुई है
तुम्हारी यादों की किरचें
और
रिस रहा है उनसे
बीते वक्त का लहू,
कितना शहद था वह वक्त
जो आज तुम्हारी बेवफाई से
रक्त-सा लग रहा है।
तुम लौटकर आ सकते थे
मगर तुमने चाहा नहीं
मैं आगे बढ़ जाना चाहती थी
मगर ऐसा मुझसे हुआ नहीं।
तुम्हारी यादों की
बहुत बारीक किरचें है
दुखती हैं
पर निकल नहीं पाती
तुमने कहा तो कोशिश भी की।
किरचें दिल से निकलती हैं तो
अँगुलियों में लग जाती है
कहाँ आसान है
इन्हें निकाल पाना
निकल भी गई तो कहाँ जी पाऊँगी
तुम्हारी यादों के बिना।
------फाल्गुनी