धरोहर
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एक नई सोच
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एक नई सोच
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Sunday, 20 November 2011
एक फेसबुकिया कविता..................संजीव तिवारी
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कविताएं भी लिखते हो मित्र.. मुझे हौले से उसने पूछा.. कविताएं ही लिखता हूं मित्र.. मैने सहजता से कहा. भाव प्रवाह को.. गद्य़ की शक्ल में...
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Saturday, 12 November 2011
सब जानते हैं...............राजीव उपाध्याय
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सब जानते हैं, मैं, आप, और सारी दुनिया, कि विवश है नारी, परतंत्रता कि बेड़ियों ने जकड़ा है उसे, काव्य गोष्ठियों में, विचार मंचो में, ...
Tuesday, 8 November 2011
नजर अपनी अपनी,,,,,,,,,,,,,,,,,,पाराशर गौड़
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एक बच्चे की आँख की रोशनी पल पल जाती रही कम होती गई माँ-बाप को हुई चिंता इसका का क्या होगा ? गर---इसकी रोशनी चली गई । बाप बोला .. ....
Tuesday, 18 October 2011
अपनी ही कहीं-किसी तिजोरी में....................राजीव थेपड़ा "भूतनाथ "
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कैसे समझाऊं उन लोगों को मैं कि जो धन वो चोरी-छुपे ले जा रहें हैं देश से बाहर या फिर अपनी ही कहीं-किसी तिजोरी में उससे संवर सकती है उनक...
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