तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Saturday, 6 August 2016

फिर उठा वो सवाल सकते हो.......लक्ष्मीनारायण ‘पयोधि’


ख़्वाब आंखों में पाल सकते हो.
दिल से लोहू निकाल सकते हो.


चाहना मत किसी भी तितली को,

तुम मुसीबत में डाल सकते हो.


मेरे अरमान फ़लक पर रोशन,
कोई पत्थर उछाल सकते हो.



जिसका मिलता नहीं जवाब कभी,
फिर उठा वो सवाल सकते हो.



उनके क़दमों से बनीं जो राहें,
रख नज़र में मिसाल सकते हो.
    
----लक्ष्मीनारायण ‘पयोधि’

Tuesday, 6 August 2013

हिन्दू भी रखते हैं रोज़ा......चन्दन भाटी

बाड़मेर। पाकिस्तान की सरहद पर बसे बाड़मेर जिले के कई गाँवों में मुस्लिम हिंदुओं के त्योहार पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं, वही हिंदू परिवार भी रमजान के पवित्र महीने में रोजे रखकर मुस्लिम भाइयों की खुशी में शरीक होते हैं। बाड़मेर जिले के सरहदी गाँवों में हिंदू परिवारों द्वारा रोजा रखने की पुरानी परंपरा रही है। विभाजन और उसके बाद भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों के दौरान भारत आए हिंदू और मुस्लिम परिवारों में समान रीति रिवाज हैं।

हिंदुओं में विशेष कर मेघवाल जाति के परिवार सिंध के महान संत पीर पिथोरा के अनुयायी हैं। सिंधी मुसलमान भी पीर पिथोरा के प्रति समान आस्था रखते हैं। पीर पिथोरा के जितने भी अनुयायी हैं वे रमजान महीने में श्रद्धानुसार रोजे रखते हैं। सरहदी गाँवों गौहड़ का तला रबासर, साता, सिहानिया, बाखासर, केलनोर सहित सैकड़ों गाँवों के हिंदू रोजे रखते हैं।

नवातला निवासी पाताराम ने बताया कि वह अपनी समझ के साथ हर साल रोजे रखते हैं। रोजे के दौरान वह बकायदा नमाज भी पढ़ते हैं। रोजे के दौरान वह पूर्णत मुस्लिम रीति रिवाजों का पालन करते हैं। पाताराम ने बताया कि उसके पिता भी रमजान के दौरान रोजे रखते थे।

सरहद पार रह रहे हिंदू-मुस्लिम परिवारों के रीति रिवाजों में भी कोई ज्यादा फर्क नही हैं। इनकी शादी-विवाह, मृत्यु, त्योहार, खान-पान पहनावा तथा भाषा भी एक जैसे हैं। हिंदू परिवारों के छोटे-छोटे बच्चे भी रोजे रखते हैं।

मौलवी हनीफ मोहम्मद ने बताया कि हिंदू और मुस्लिम रीति रिवाजों में इतनी समानता है कि कई बार इनके भेद करना भी मुश्किल हो जाता है। रमजान में तो हिंदू-मुस्लिम साथ-साथ रोजे रखते हैं एक-दूसरे के यहाँ इफ्तार भी करते हैं।

हालाँकि पीर पीथोरा का धार्मिक स्थल पाकिस्तान में है मगर उनके अनुयायियों ने बाड़मेर जिले में जरासिधर गाँव के समीप जेता की जाल नामक धार्मिक स्थल बनाया हुआ है। पीर पिथोरा की जियारत करने वालों में मुसलमानों की संख्या भी काफी अधिक रहती है।
- चन्दन भाटी

Thursday, 13 December 2012

अर्जी छुट्टी की..........संतोष सुपेकर










छुट्टी की अर्जी,
केवल एक कागज
या दस्तावेज
ही नहीं....

एक भावना है..
एक आशा है
उम्मीद है...और
हक भी है

एक धमकी है..
बहाना है.... और
सपना भी है

सपना, जो टूटता भी है कभी
जब होती है खारिज अर्जी
और लिखा मिलता है उसपर
अस्वीकृत..

मुस्कुराते हुए बॉस की मर्जी

और...एक और छुट्टी की अर्जी
जो हरदम स्वीकृत ही होती है
इस घोर कलियुग में भी
मानवतता यहाँ नही सोती है

वह अर्जी है...
माँ की बीमारी की वजह से
माँगी गई छुट्टी
अक्सर उस 'बीमार' माँ के लिये
जो मर चुकी है,
कई वर्ष पूर्व गाँव मे..

--संतोष सुपेकर
--संपादनः यशोदा अग्रवाल

Wednesday, 12 December 2012

नज़्म 'बलूग़त'...................अब्दुल अहद साज़



मेरी नज़्म
मुझसे बहुत छोटी थी
खेलती रहती थी पेहरों आग़ोश में मेरी
आधे अधूरे मिसरे मेरे गले में बाँहें डाले झूलते रहते

ज़ेहन के गेहवारे में हमकते,
दिल के फ़र्श पर रोते मचलते,
नोक-ए-क़लम पर शोर मचाते, ज़िद करते,
माअनी की तितलियों के पीछे दौड़ते फिरते थे अल्फ़ाज़

मेरी नज़्म
मुझसे बहुत छोटी थी
जाने समय कब बीत गया
गुड़ियों के पर निकले और वो परियों से आज़ाद हुईं
लफ़्ज़ जवाँ होकर इज़हार की रेह चल निकले

और मैं--------तन्हा,
अपनी पराई आँखों से ये देख रहा हूँ,
मेरी उंगली थाम के चलने वाली नज़्म
अब अपने पैरों पे खड़ी है

मेरी नज़्म
मुझ से बड़ी है 

शायर : अब्दुल अहद साज़

झुक के हम मिलते हैं बेशक ............अन्सार कम्बरी


वक़्त है ऐसा परिंदा लौट कर आता नहीं,
जो गुज़र लाता है लम्हा खुद को दोहराता नहीं !

झुक के हम मिलते हैं बेशक गिर के हम मिलते नहीं,
जी हमारा दिल अना को ठेस पहुंचाता नहीं !

साफ-सुथरी ज़िन्दगी में बाल न पड़ता अगर,
आईना दिल का तेरी आँखों से टकराता नहीं !

दोस्तों की महफ़िलें हों चाहे हों तन्हाईयाँ,
आपको देखा है जब से कुछ हमें भाता नहीं !

'क़म्बरी' सच्चाई पर चलना तो मुश्किल है मगर,
जो भटक जाता है राहें मंजिलें पाता नहीं !


---अन्सार कम्बरी

बांसुरी-सी बज रही है सुन जरा............ओम प्रभाकर

तू अभी से सो रही है, सुन जरा
रातरानी महकती है सुन जरा।

सुन जरा मेरे लबों की तिश्नगी
तिश्नगी भी चीखती है सुन जरा।

 
कुछ दिनों से क्यूं हमारे दरम्यां
बांसुरी-सी बज रही है सुन जरा।

 
हदे-शोरो-गुल ये मेरी खामुशी
बेनवा कुछ कह रही है सुन जरा।

 
हां, अभी भी गोशा-ए-दिल में कहीं
एक नागिन रेंगती है, सुन जरा।


--ओम प्रभाकर

Thursday, 30 August 2012

हमारी याद आएगी...........रचनाकार :: अज्ञात

किसी से चोट खाओगे

हमारी याद आएगी,

तलाशोगे एक कतरा प्यार का,

किसी से कह न पाओगे,

तलाशोगे मुझे फिर तुम,

दिलों की तनहाइयों में,

कभी जब तनहा बैठोगे,

हमारी याद आएगी.

लौटा हूँ बहुत मायूस होकर

मैं तेरे दर से,

कभी खामोश बैठोगे

हमारी याद आएगी

समेट लेता सारे अश्क

तेरी आँखों की कोरों से,

कभी जब अश्क देखोगे

हमारी याद आएगी...!! 

रचनाकार:: अज्ञात 

प्रस्तुतिकरण :: सोनू अग्रवाल