तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Thursday, 13 December 2012

अर्जी छुट्टी की..........संतोष सुपेकर










छुट्टी की अर्जी,
केवल एक कागज
या दस्तावेज
ही नहीं....

एक भावना है..
एक आशा है
उम्मीद है...और
हक भी है

एक धमकी है..
बहाना है.... और
सपना भी है

सपना, जो टूटता भी है कभी
जब होती है खारिज अर्जी
और लिखा मिलता है उसपर
अस्वीकृत..

मुस्कुराते हुए बॉस की मर्जी

और...एक और छुट्टी की अर्जी
जो हरदम स्वीकृत ही होती है
इस घोर कलियुग में भी
मानवतता यहाँ नही सोती है

वह अर्जी है...
माँ की बीमारी की वजह से
माँगी गई छुट्टी
अक्सर उस 'बीमार' माँ के लिये
जो मर चुकी है,
कई वर्ष पूर्व गाँव मे..

--संतोष सुपेकर
--संपादनः यशोदा अग्रवाल

Thursday, 30 August 2012

हमारी याद आएगी...........रचनाकार :: अज्ञात

किसी से चोट खाओगे

हमारी याद आएगी,

तलाशोगे एक कतरा प्यार का,

किसी से कह न पाओगे,

तलाशोगे मुझे फिर तुम,

दिलों की तनहाइयों में,

कभी जब तनहा बैठोगे,

हमारी याद आएगी.

लौटा हूँ बहुत मायूस होकर

मैं तेरे दर से,

कभी खामोश बैठोगे

हमारी याद आएगी

समेट लेता सारे अश्क

तेरी आँखों की कोरों से,

कभी जब अश्क देखोगे

हमारी याद आएगी...!! 

रचनाकार:: अज्ञात 

प्रस्तुतिकरण :: सोनू अग्रवाल

Monday, 20 August 2012

पिछले पन्नों में‍ लिखी जाने वाली कविता......तिथि दानी

अक्सर पिछले पन्नों में ही
लिखी जाती है कोई कविता
फिर ढूंढती है अपने लिए
एक अदद जगह
उपहारस्वरूप दी गई
किसी डायरी में
फिर किसी की जुबां में
फिर किसी नामचीन पत्रिका में

फिर भी न जाने क्यों
भटकती फिरती है ये मुसाफिर
खुद को पाती है एकदम प्यासा
अचानक इस रेगिस्तान में
उठते बवंडर संग उड़ चलती हैं ये
बवंडर थककर खत्म कर देता है
अपना सफर
लेकिन ये उड़ती जाती हैं
और फैला देती है
अपना एक-एक कतरा
उस अनंत में जो रहस्यमयी है।
लेकिन एक खास बात
इसके बारे में,
आगोश से इसके चीजें
गायब नहीं होतीं
और न ही होती है
इनकी इससे अलग पहचान

लेकिन यह कविता
शायद! अपने जीवनकाल में
सबसे ज्यादा खुश होती है
यहां तक पहुंचकर
क्योंकि
ब्रह्माण्ड के नाम से जानते हैं
हम सब इसे।





-तिथि दानी

Thursday, 19 July 2012

दिन सावन के...................विनोद रायसरा

दिन सावन के
तरसावन के


कौंधे बिजली
यादें उजली
अंगड़ाई ले
सांझें मचली

आते सपने
मन भावन के...

चलती पछुआ
बचते बिछिआ
सिमटे-सहमें
मन का कछुआ

हरियाए तन
सब घावन के

नदिया उमड़ी
सुधियां घुमड़ी
लागी काटन
हंसुली रखड़ी

छाये बदरा
तर-सावन के..

बरसे बदरा
रिसता कजरा
बांधूं कैसे
पहुंची गजरा

बैरी दिन हैं
दुख पावन के...

मीठे सपने
कब है अपने
चकुआ मन का
लगता जपने

कितने दिन हैं
पिऊ आवन के..


--विनोद रायसरा

Friday, 13 July 2012

सावन के झूले...............राजेश राज चौहान

मेरे गांव के सावन के झूले,
कैसे उनको मेरा भोला मन भूले,,
सजना संग सजनी खिल मुसकाती,
धूले बैर भाव प्यार मन मे घुले,,
मेरे गांव के.......1

 
ना कोई उम्र का बंधन,
नीम, अम्बिया, पीपल, चंदन,,
क्या बच्चे क्या बूढ़े सब,
चहु ओर गीतो मे सावन वंदन,,
ना कोई उम्र.......2

झूले कभी अकेले कभी दुकेले,

भूले मन सब कष्टो के झमेले,,
ऊमड़-घुमड़कर काली घटाये,
अबतो हर पल सवान मस्त मजे ले,,
झूले कभी अकेले.......3

इस पार कभी तो उस पार कभी,

बावरा मन तितली-सा उडता यार अभी,,
ख़िलखिलाते खेत लहलहाती फसले,
हर्ष बिखरे सार्थक धरा का भार तभी,,
इस पार कभी तो.......4

सावन मचले रिमझिम रिमझिम,

पानी बरसे छम छम छम,,
मयुर नाचते पंख पसारे,
नीड़ों से होती ची-ची हरदम,,
सावन मचले.......5


-राजेश राज चौहान

Tuesday, 10 July 2012

तुम्हारी पलकों की कोर पर...........''फाल्गुनी''

कुछ मत कहना तुम
मैं जानती हूँ
मेरे जाने के बाद
वह जो तुम्हारी पलकों की कोर पर
रुका हुआ है
चमकीला मोती
टूटकर बिखर जाएगा
गालों पर
और तुम घंटों अपनी खिड़की से
दूर आकाश को निहारोगे
समेटना चाहोगे
पानी के पारदर्शी मोती को,
देर तक बसी रहेगी
तुम्हारी आँखों में
मेरी परेशान छवि
और फिर लिखोगे तुम कोई कविता
फाड़कर फेंक देने के लिए...
जब फेंकोगे उस
उस लिखी-अनलिखी
कविता की पुर्जियाँ,
तब नहीं गिरेगी वह
ऊपर से नीचे जमीन पर
बल्कि गिरेगी
तुम्हारी मन-धरा पर
बनकर काँच की कि‍र्चियाँ...
चुभेगी देर तक तुम्हें
लॉन के गुलमोहर की नर्म पत्तियाँ।


----स्मृति जोशी ''फाल्गुनी''

Tuesday, 29 May 2012

मौसम और मन .....यशवन्त माथुर

मेरे ब्लाग धरोहर की सौवीं पोस्ट.........
मौसम और मन...भाई यशवन्त माथुर
कभी धूप
कभी छाँव

कभी गर्मी

कभी ठंड

कभी बरसात

कभी बसंत

बदलता है मौसम

पल पल रंग।


मन भी तो ऐसा ही है

बिलकुल मौसम जैसा

पल पल बदलता हुआ

कभी अनुराग रखता है

प्रेम मे पिघलता है

और कभी

जलता है

द्वेष की गर्मी मे।


ठंड मे ठिठुरता है

किटकिटाता है

क्या हो रहा है-

सही या गलत

समझ नहीं पाता है

जम सा जाता है मन

पानी के ऊपर तैरती

बरफ की सिल्ली की तरह ।


मन!

जब बरसता है

बेहिसाब बरसता ही

चला जाता है

बे परवाह हो कर

अपनी सोच मे

अपने विचारों मे

खुद तो भीगता ही है

सबको भिगोता भी है

जैसे पहले से ही

निश्चय कर के निकला हो

बिना छाते के घर से बाहर ।


बसंत जैसा मन !

हर पल खुशनुमा सा

एक अलग ही एहसास लिये

कुछ कहता है

अपने मन की बातें करता है

मंद हवा मे झूमता है

इठलाता है

खेतों मे मुसकुराते

सरसों के फूलों मे

जैसे देख रहा हो

अपना अक्स।


मौसम और मन

कितनी समानता है

एकरूपता है

भूकंप के जैसी

सुनामियों के जैसी

ज्वालामुखियों के जैसी

और कभी

बिलकुल शांत

आराम की मुद्रा मे

लेटी हुई धरती के जैसी
। 
--यशवन्त माथुर
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