
भाषा और
ज्ञान के बाद भी
बाकी है बहुत कुछ
ये भाषाएँ
ये ज्ञान की बातें
रहने दीजिए..सीमित
समझता है कौन
आज के इस युग में
इन बातों को...
युग की बात को
युग तक ही रखें...
आज-कल..
इस तरह की भाषा
और ज्ञान भी इसी
तरह का चाहिए..
मसलन..
मौसम मन का
हो जाता है अजीब...
रहता है हरदम...
आवाज के बगैर..
रहता है दर्द
रिसता है मन का
बुझती सी है
खुशियाँ..
आँगन की...
पन्ना एक पलटने के बाद
आ जाती वापस...
सुगंध एक मादक सी
काफूर हो जाता है
दर्द मन का..
खिल जाते हैं फूल
बिखरता है मकरंद
-यशोदा
मन की उपज






