तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Thursday, 9 November 2017

पन्ना एक पलटने के बाद....


भाषा और
ज्ञान के बाद भी
बाकी है बहुत कुछ
ये भाषाएँ
ये ज्ञान की बातें
रहने दीजिए..सीमित
समझता है कौन
आज के इस युग में

इन बातों को...
युग की बात को
युग तक ही रखें...

आज-कल..
इस तरह की भाषा
और ज्ञान भी इसी
तरह का चाहिए..
मसलन..

मौसम मन का
हो जाता है अजीब...
रहता है हरदम...
आवाज के बगैर..
रहता है दर्द 
रिसता है मन का
बुझती सी है
खुशियाँ..
आँगन की...
पन्ना एक पलटने के बाद
आ जाती वापस...
सुगंध एक मादक सी
काफूर हो जाता है
दर्द मन का..

खिल जाते हैं फूल
बिखरता है मकरंद
-यशोदा
मन की उपज





Tuesday, 7 November 2017

भूल-भुलैय्या......


भाषा में 
होता है ज्ञान
और...
अपना ज्ञान भी 

होता है भाषा का
छोटे शब्दों में कहिए तो
भाषा यानि
ज्ञान भी
न मौन है
भाषा
और न ही
ज्ञान मौन है
एक पहचान है
भाषा...
जो अपने आप में
पूर्णता तक ..
पहूँचती है

...
पहुँच है तो
एक मार्ग के साथ
और एक ही भाषा
होती ही नही मार्ग की

मौन होते हैं कई
बोलिया भी है कई

और अंततः
यही होता है
ज्ञान...

-यशोदा
मन की उपज

Monday, 6 November 2017

ऐसे ही अज्ञानी सर्वत्र हैं....


ज्ञान... 
किसी घराने की 
अनुशंसा नहीं कि
किसी ने कहा और 
कोई अमर हो गया
कालजयी बन गया
इतना भी नहीं तो 
वर्ष का सर्वश्रेष्ठ हो गया....
बाज़ार इसी तरह 
मूर्खों की मतिभ्रष्ट करता है....
बाज़ार को जो 
पीकदान न समझे 
वह ज्ञानी नहीं 
और ऐसे ही 
अज्ञानी सर्वत्र हैं....

बहरहाल.....
ज्ञान और भाषा 
दोनों भले ही 
किसी स्तर पर 
मौन हों, 
पर तब 
मौन ही भाषा 
और वह
ज्ञान की रंगत का 
प्रतिनिधित्व करता है ।
-यशोदा
मन की उपज

Sunday, 5 November 2017

ज्ञान की भाषा....मन की उपज



ज्ञान की....भाषा
ज्ञान होता है
और इसे पाएं 
कैसे...
एक प्रश्न है जटिल
....
कहा जाता है
भाषा से होती है
पैदाइश ज्ञान की
ये भी कहते हैं 
भाषा का अपना 
ज्ञान भी होता है ।
छोटे शब्दों में 
भाषा यानी ज्ञान भी ।
....
भाषा न तो 
मौन है
न ही मौन है ज्ञान
एक पहचान है
भाषा..जो
पहुंच रखती है
अपने साथ
पूर्ण रूप से
हमारे मन तक
....
भाषा पहुंच रखती है
एक मार्ग के साथ
और उस मार्ग की
भाषा एक नहीं होती
.........
भाषाएँ रहती है कई
मौन भी
बोलियाँ भी
और..
माने सही तो
इसे ही कहते है ज्ञान
-मन की उपज

Saturday, 4 November 2017

सरकारी रचनाकार...मन की उपज


सरकारी रचनाकार
सरकारी होकर
जीता कम है
पर ...
मरता अधिक है

सरकारी होना
रचनाकार का
जीत नहीं है 
वरन् करारी हार है
सरकार की

वजह.. यही
सरकारी रचनाकार ..
असंतुष्ट हो....तो
नज़र आए हैं
ज़मीदोज़ करते 

सरकार को 

वजह..

माया..
सत्ता है 
सरकार की
और यही..
माया....पगला
देती है रचनाकार को
और..पगला रचनाकार
रचता कब है ! 

माया की सत्ता पर... 
जल..
बिखेर देता है ।
-मन की उपज




Thursday, 2 November 2017

सुख या फिर ख़ुशी......मन की उपज

चुनते हैं हम
सुख या फिर
ख़ुशी..
रह कर भी
शिविर में ..
प्रताड़नाओं के
हम मन के
मौसम को... 
बासन्ती बना सकते हैं
कोई इन्सान..
कोई वस्तु 
या फिर 
प्रक्रिया हो 
कोई भी....
इतनी बलशाली नहीं
कि हमारे मन पर
कब्ज़ा कर सके
वो भी बगैर हमारी 
मर्जी....और हम
मन से..करते हैं 
कोशिश...और
तलाश लेतें हैं
खुशियाँ...
-मन की उपज
#हिन्दी दिवस

Thursday, 13 December 2012

अर्जी छुट्टी की..........संतोष सुपेकर










छुट्टी की अर्जी,
केवल एक कागज
या दस्तावेज
ही नहीं....

एक भावना है..
एक आशा है
उम्मीद है...और
हक भी है

एक धमकी है..
बहाना है.... और
सपना भी है

सपना, जो टूटता भी है कभी
जब होती है खारिज अर्जी
और लिखा मिलता है उसपर
अस्वीकृत..

मुस्कुराते हुए बॉस की मर्जी

और...एक और छुट्टी की अर्जी
जो हरदम स्वीकृत ही होती है
इस घोर कलियुग में भी
मानवतता यहाँ नही सोती है

वह अर्जी है...
माँ की बीमारी की वजह से
माँगी गई छुट्टी
अक्सर उस 'बीमार' माँ के लिये
जो मर चुकी है,
कई वर्ष पूर्व गाँव मे..

--संतोष सुपेकर
--संपादनः यशोदा अग्रवाल