तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा
Showing posts with label मन की उपज. Show all posts
Showing posts with label मन की उपज. Show all posts

Wednesday, 16 December 2020

रसहीन उत्सव

बीत गई
फीकी दीपावली
उत्साहविहीन
सुविधा विहीन
यंत्रवत जीवन जिया 
एक मशीन की तरह

सुबह से शाम तक
रात में भी सोने के पहले
एक चिंतन कि
कल की कल-कल
मन में असंतोष
खुशियाँ सारी समाप्त,

मास्क पहनने
और हाथ धोने में
बची खुची कसर
चढ़ गई बनकर भेंट
इस कहर भरी
विदेशी विषाणुओं रचित
महामारी कोरोना की भेट

घर पर रहकर मानव
महज निसहाय 'औ'
किस्से -कहानी तक
रह गया सीमित
यह महोत्सव दीपावली का
रस्म अदाई हो गई है..
-यशोदा
तस्वीर क्या बोले समूह मे स्वरचित






Saturday, 7 March 2020

जिजीविषा ....मन की उपज


स्त्रियों का हास्य बोध 
और जिजीविषा
गिन नहीं पाएँगे आप
कितनों के निशाने पर रहती है स्त्री
हारी नहीं फिर भी
रहती है हरदम जूझती
कभी हंसकर..तो
कभी खामोशी से
या फिर करके विद्रोह..
कारण है एक ही
उसने हर तरह की
चुनौतियां और मुश्किलें
हंसकर पार की है
वजह है..
प्रकृति ने उसे 
असंख्य गुण
व अद्भुत सहनशीलता
के गुणों से 
नवाजा है
सामाजिक
निशानदेही 
स्त्रियों के बिना
अकल्पनीय है
धैर्य का पल्लवन है वो
स्नेह और प्यार का
अतुल कोश है उसके पास
कितना भी लिखूँ 
स्त्रियों को
क़लम के दायरे से
उफ़नकर
बह ही जाती हैं।
-मन की उपज

Wednesday, 29 May 2019

ज़िंदगी के मायने और है


आज की चाहतें और है
कल की ख़्वाहिशें और हैं
जो जीते है ज़िंदगी के पल-पल को
उसके लिये ज़िंदगी के मायने और है

हसरतें कुछ और हैं
वक़्त की इल्तज़ा कुछ और है
हासिल कुछ हो न हो
उम्र का फलसफ़ा कुछ और है

कौन जी सका है...
ज़िन्दगी अपने मुताबिक
वक़्त की उंगली थामे
हर मोड़ की कहानी कुछ और है 

ख़यालों के सफ़र में
हक़ीकत और ख़्वाब बुने जाते हैं
दिल चाहता कुछ और है
पर होता कुछ और है

यूं तो जिंदगी में आवाज देने वाले,
ढेरों मिल जायेंगे .......!!
कुछ पल सुकून आ जाये
ऐसे हमनवां का एहसास और है.....!!

मन की उपज

Wednesday, 9 May 2018

सरेआम भले ही हो....यशोदा


उसे पाने की 
कोशिश का
चढ़ा है नशा..
है आ रही महक
गुलाब की
रात देखा था 
इक ख़्वाब सा
किया था हमने
इज़हार प्यार का
कर रहा हूँ इन्तेज़ार
तेरे इकरार का
किया है इक वादा
वफ़ा का
पर....
पुरज़ोर कोशिश
कि, मेरी मोहब्बत
सरेआम भले ही हो
पर तमाम न हो 
मन की उपज
-यशोदा

Thursday, 12 April 2018

अहिल्या को नहीं भुगतना पड़ेगा.....मन की उपज


विडम्बना 
यही है की 
स्वतंत्र भारत में 
नारी का 
बाजारीकरण किया जा रहा है,

प्रसाधन की गुलामी, 
कामुक समप्रेषण 
और विज्ञापनों के जरिये 
उसका.......... 
व्यावसायिक उपयोग 
किया जा रहा है. 

कभी अंग भंगिमाओं से, 
कभी स्पर्श से, 
कभी योवन से तो 
कभी सहवास से 
कितने भयंकर परिणाम 
विकृतियों के रूप में 
सामने आए हैं, 

यही नही 
अनाचार के बाद 
जिन्दा जला देने 
जैसी निर्ममता से 
किसी की रूह 
तक नहीं कांपती 

क्यों....क्यों.. 
आज भी 
पुरुषों के लिये 
खुले दरवाजे 

और....और.. 
स्त्रियों के लिये
उफ....... 
कोई रोशनदान तक नहीं?

मैं कहती हूँ.... 
स्त्री नारी होती नहीं 
बनाई जाती है. 

हम सबको 
अब यह संकल्प लेना होगा 
कि अब और नहीं..
कतई नहीं, 
अब किसी इन्द्र के 
पाप का दण्ड 
अब किसी भी 
अहिल्या को 
नहीं भुगतना पड़ेगा

मन की उपज
-यशोदा
डायरी से....
28-9-14

Saturday, 17 March 2018

फिर...आपकी देह के इर्द-गिर्द... मन की उपज

जब आप बीमार रहते हैं तो 
बना रहता है हुजूम
तीमारदारों का 
और ये.. 
वो ही रहते हैं 
जिनकी बीमारी में...
आपने चिकित्सा व्यवस्था 
करवाई थी 
पर भगवान न करे...
आपकी मृत्यु हो गई 
तो...वे 
आपको आपके घर तक 
पहुंचा भी देंगे..
और फिर...
....आपकी देह के 
इर्द-गिर्द... 
रिश्तेदारों का 
जमावड़ा शुरु हो जाएगा...
कुछ ये जानने की 
कोशिश में रहेंगे कि 
हमें कुछ दे गया या नहीं....
यदि नहीं तो... 
आस लग जाती है 
घर के बचे लोगों से 
कि निशानी को तौर पर 
क्या कुछ मिलेगा..
पर डटे रहते हैं 
पूरे तेरह दिन तक...
-यशोदा-मन की उपज

Wednesday, 14 February 2018

ना होती स्त्री मैं तो


सीमित हूँ 
बहुत.....मैं
शब्दों में....
अपने ही
लेकिन, हूँ
विस्तृत बहुत
अर्थों में..... मेरे
अपने ही...
ना होती स्त्री 
मैं  तो...कहो
कहाँ होता...अस्तित्व 
तुम्हारा.........भी
मेरे होने से.... ही
तुम पुरुष हो....वरना 
व्यर्थ है... 
तुम्हारा...यह 
व्यक्तित्व....
-मन की उपज

Tuesday, 9 January 2018

जलता रहता है अलाव एक


जाने के बाद
तुम्हारे
अक्सर
ख़्यालों में 
तुमसे मिलकर
लौटने के बाद
हल्की-हल्की
आँच पर
खदबदाता रहता है
तुम्हारा एहसास 
लिपट कर साँसों से
पिघलता रहता है
कतरा-कतरा।
बनाने लगती हूँ
कविता तुम्हारे लिए
अकेलेपन की.......
जलता रहता है
अलाव एक
बुझते शरारों के बीच
फिर उम्मीद जगती है
और एक मुलाकात की
फिर.....तुम्हारे लिए
तुमसे मिलूँ.....
एक और नई
कविता के लिए

-यशोदा
-मन की उपज

Wednesday, 3 January 2018

आनन्द प्रेम का...



आनन्द
प्रेम का...
असम्भव है 
शब्दों में 
बता पाना
और ये भी कि 
क्या है प्रेम का
कारण... 
यह गूंगे का गुड़ है 
देह, मन, आत्मा का 
ऐसा आस्वाद है 
जिसके विवेचन में
असमर्थ हो जाती
इंद्रियां भी...
अलसा जाती हैं....
आस्वाद प्रेम का 
अनुभव तो करती हैं 
पर उसी रूप में
नहीं कर पाती
व्यक्त 
यही कारण है कि 
आज भी प्रेम 
अपरिभाषित है, 
नव्य है....
काम्य है....
ऐसा कौन सा
जीव होगा...
जो अछूता है
जादू नहीं चला
अबोध हो या
सुबोध हो 
अज्ञ, तज्ञ या विज्ञ
भी समझते हैं
आभा प्रेम की
स्पर्श प्रेम का
देह, मन और आत्मा को 
छू लेता है.... 
पेड़-पौधे तक 
इस स्पर्श को 
समझते हैं....
सृष्टि का आधार
प्रेम ही तो है....और
ये सृष्टि भी...
उसी का सृजन है
कहने को तो
अक्षर ढाई ही हैं
पर है तो..अब तक
अपरिभाषित...

-यशोदा
मन की उपज

Thursday, 14 December 2017

एक और शाम....



एक और शाम
उतर आयी आँखों में
भर गयी नम किरणें
खुला यादों का पिटारा...
भीग गयी पलकें
फैलकर उदासी 
धुंधला गयी चाँद को 
झोंका सर्द हवा का
लिपटकर तन से
छू गया अनछुआ मन
ठंडी हथेलियों को चूम
चाँदनी महक गयी 
ओढ़ यादों की गरमाहट
लब मुस्कुराये
जैसे हो स्नेहिल स्पर्श तुम्हारा
- यशोदा
मन की उपज

Thursday, 7 December 2017

बयां करेगी किस्से


ऐ कविता
एक तलब सी 
बन गई हो 
इस जिंदगी में तुम......
जो बिन तुम्हारे 
अधूरी सी 
हो चली है.......
हर सपनो में तुम 
और 
तुम में ही 
हर सपना है मेरा.........
जानता हूँ 
दिल में रखे 
ये मोहब्बत के पन्ने 
एक रोज
उड़ जाएंगे हवा में
काफूर बन के…....
फिर भी 
कम नहीं होती 
ये तलब 
तेरे प्यार की......
सोचता हूँ 
ये क्या कम है 
कि जिंदगी 
खामोश होकर भी 
बयां करेगी किस्से 
-यशोदा
मन की उपज

Wednesday, 6 December 2017

कहाँ से आएगी माँ....


सोनोग्राफी क्लिनिक के अन्दर
एक महिला ने
थरथराते होठों से
एकान्त में..कहा
घर वाले मेरा ..
करवाना चाहते हैं
परीक्षण
जानना चाहते वे
लड़का है या फिर लड़की
अन्तरात्मा मेरी
धिक्कारती है मुझको
मैडम आप ही 
कोई दीजिए सुझाव
कह दीजिए आप
अगर 
आपने यह परीक्षण करवाया
तो प्रसव मैं नही करवा सकती..
हाँ,"मैडम ने कहा"
वैसे भी गलत भी 
हो जाते हैं कई टेस्ट 
सौ प्रतिशत 
कोई नहीं बता सकता
फिर मैडम ने कहा
क्यों नही चाहती आप??
क्या नहीं चाहिए बेटा??
लड़की तो हैं न एक फिर
ये खतरा क्यूँ...
वो महिला बोल पड़ी....
खतरा...
हाँ लड़की जन्मना 
खतरा ही तो है
पर,मैडम जी जब
एक माँ ऐसा सोचने लगे
तो फिर माँ कौन बनेगा
ये सृष्टि कैसे चलेगी???
-यशोदा..
मन की उपज

Tuesday, 5 December 2017

उड़ चला है वक्त.....


वक्त है
या नहीं है वक्त
वक्त का क्या
बीतता जाता है
कोसना वक्त को
मूर्खता है निरी
अनमोल देन है ये
वक्त.....दाता की
नेमत है ये वक्त
वक्त का...
हर लम्हा अकूत मूल्य
रखता है... जुड़ें रहें
इस वक्त से..आप
थाम नहीं सकते...
वक्त को...आपको
चलना ही होगा साथ
वक्त के....कोशिश
कीजिए मुस्कुराने की
वक्त के साथ..
हमें कोई... 
इख़्तियार नहीं
वक्त की चाल पर 
फिर भी हर पल
दावा पेश करते हैं
वक्त के अपना होने का
- यशोदा
मन की उपज



Thursday, 16 November 2017

रूठे हैं अपने ही.....



रूठे हैं अपने ही
तो हुआ क्या
साथ ही तो छूटा
तो हुआ क्या
एक तिनका ही टूटा 
नीड़ का ...बस
एक पुल ही टूटा 
उम्मीदों का
हुई राहें
बेगानी.
उलझकर काँटों से
बनी दर्द की 
नयी एक कहानी
कोई ज़ख़्म पुराना
हुआ ताजा
राह में ज़िन्दगी के
पर,तुम न हो ख़फ़ा
खुद से ज़रा भी
है न रास्ता...
देखो टटोलकर
बटोरकर
हौसला
देखो पलट कर
वो साया है
तुम्हारा ही..
तलाशो उसे
अपने भीतर
भूलकर अंधेरे को
जला लो फिर से
एक बाती 
वजूद की 
शिनाख्त के लिए
अंतर्मन के कोने में
-यशोदा
मन की उपज


Monday, 6 November 2017

ऐसे ही अज्ञानी सर्वत्र हैं....


ज्ञान... 
किसी घराने की 
अनुशंसा नहीं कि
किसी ने कहा और 
कोई अमर हो गया
कालजयी बन गया
इतना भी नहीं तो 
वर्ष का सर्वश्रेष्ठ हो गया....
बाज़ार इसी तरह 
मूर्खों की मतिभ्रष्ट करता है....
बाज़ार को जो 
पीकदान न समझे 
वह ज्ञानी नहीं 
और ऐसे ही 
अज्ञानी सर्वत्र हैं....

बहरहाल.....
ज्ञान और भाषा 
दोनों भले ही 
किसी स्तर पर 
मौन हों, 
पर तब 
मौन ही भाषा 
और वह
ज्ञान की रंगत का 
प्रतिनिधित्व करता है ।
-यशोदा
मन की उपज

Saturday, 4 November 2017

सरकारी रचनाकार...मन की उपज


सरकारी रचनाकार
सरकारी होकर
जीता कम है
पर ...
मरता अधिक है

सरकारी होना
रचनाकार का
जीत नहीं है 
वरन् करारी हार है
सरकार की

वजह.. यही
सरकारी रचनाकार ..
असंतुष्ट हो....तो
नज़र आए हैं
ज़मीदोज़ करते 

सरकार को 

वजह..

माया..
सत्ता है 
सरकार की
और यही..
माया....पगला
देती है रचनाकार को
और..पगला रचनाकार
रचता कब है ! 

माया की सत्ता पर... 
जल..
बिखेर देता है ।
-मन की उपज