तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Thursday, 7 December 2017

बयां करेगी किस्से


ऐ कविता
एक तलब सी 
बन गई हो 
इस जिंदगी में तुम......
जो बिन तुम्हारे 
अधूरी सी 
हो चली है.......
हर सपनो में तुम 
और 
तुम में ही 
हर सपना है मेरा.........
जानता हूँ 
दिल में रखे 
ये मोहब्बत के पन्ने 
एक रोज
उड़ जाएंगे हवा में
काफूर बन के…....
फिर भी 
कम नहीं होती 
ये तलब 
तेरे प्यार की......
सोचता हूँ 
ये क्या कम है 
कि जिंदगी 
खामोश होकर भी 
बयां करेगी किस्से 
-यशोदा
मन की उपज

8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (08-12-2017) को "मेरी दो पुस्तकों का विमोचन" (चर्चा अंक-2811) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. जी नमस्ते,
    आप की रचना को शुक्रवार 8 दिसम्बर 2017 को लिंक की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...

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  3. ऐ कविता
    एक तलब सी
    खामोश होकर भी
    बयां करेगी किस्से

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  4. वाह ! खूबसूरत रचना ! बहुत खूब आदरणीया ।

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  5. वाह बहुत सुन्दर भाव जैसे एक आदत या फिर लत जैसे चाय की। बहुत सरल सहज भावों का प्रवाह।
    शुभ रात्री।

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  6. ये तलब
    तेरे प्यार की......
    सोचता हूँ
    ये क्या कम है
    कि जिंदगी
    खामोश होकर भी
    बयां करेगी किस्से --क्या बात है !!!!! ये तलब ना होती तो सृजन कहाँ से आता ? सादर सस्नेह ----



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