धरोहर
Wednesday, 16 December 2020
रसहीन उत्सव
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बीत गई फीकी दीपावली उत्साहविहीन सुविधा विहीन यंत्रवत जीवन जिया एक मशीन की तरह सुबह से शाम तक रात में भी सोने के पहले एक चिंतन कि कल की कल-क...
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Sunday, 25 October 2020
नारी की आकांक्षा
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एक स्त्री के लिए प्रेम से बढ़कर भी कुछ हो सकता है, तो वो है सम्मान या रिस्पेक्ट..। क्षणिक हो सकता है प्रेम ..पर सम्मान नहीं होता क्षणिक..वो क...
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Sunday, 10 May 2020
वक़्त की हर गाँठ पर ....मन की उपज
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वक़्त की हर गाँठ पर हँसते-मुस्कुराते जीने के लिए कुछ संज़ीदगी भी जरुरी है। ये जो दौर है महामारी का वायरस के डंक से च़...
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Saturday, 7 March 2020
जिजीविषा ....मन की उपज
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स्त्रियों का हास्य बोध और जिजीविषा गिन नहीं पाएँगे आप कितनों के निशाने पर रहती है स्त्री हारी नहीं फिर भी रहती है हरदम जूझती कभी ...
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Friday, 13 September 2019
हिन्दी में हैं हम..
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हिस्सा है हिन्दी हमारे अस्तित्व का ... ये वो पुल है जो... ले जाती है सुखों तक पहुंचाती है हमें संतुष्टि के शिखरो पर जोड़ती है..ह...
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Monday, 24 June 2019
बड़प्पन
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बड़प्पन मायके आयी रमा, माँ को हैरानी से देख रही थी। माँ बड़े ध्यान से आज के अखबार के मुख पृष्ठ के पास दिन का खाना सजा रही थी। दाल, रोट...
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Wednesday, 29 May 2019
ज़िंदगी के मायने और है
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आज की चाहतें और है कल की ख़्वाहिशें और हैं जो जीते है ज़िंदगी के पल-पल को उसके लिये ज़िंदगी के मायने और है हसरतें कुछ और हैं वक़्...
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