धरोहर
Wednesday, 30 January 2019
शब्दों का खेत
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'शब्दों के खेत' में आओ खामोशियों को बोएँ तितलियों के पंखो को सपनो की जादुई छड़ी से सहलाएं.... अंतर्मन की आंखो से बीते हुए ...
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Wednesday, 9 May 2018
सरेआम भले ही हो....यशोदा
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उसे पाने की कोशिश का चढ़ा है नशा.. है आ रही महक गुलाब की रात देखा था इक ख़्वाब सा किया था हमने इज़हार प्यार का कर रहा हूँ इन्ते...
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Thursday, 12 April 2018
अहिल्या को नहीं भुगतना पड़ेगा.....मन की उपज
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विडम्बना यही है की स्वतंत्र भारत में नारी का बाजारीकरण किया जा रहा है, प्रसाधन की गुलामी, कामुक समप्रेषण और विज्ञापनों के जर...
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Saturday, 17 March 2018
फिर...आपकी देह के इर्द-गिर्द... मन की उपज
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जब आप बीमार रहते हैं तो बना रहता है हुजूम तीमारदारों का और ये.. वो ही रहते हैं जिनकी बीमारी में... आपने चिकित्सा व्यवस्था करवाई थी...
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Wednesday, 7 March 2018
एक ख़त परमपिता परमेश्वर के नाम
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हे परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय हृदय वंदन। इस संसार की हम सभी महिलाएँ आपको धन्यवाद देना चाहती हैं कि आपने हमें अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति और...
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Wednesday, 14 February 2018
ना होती स्त्री मैं तो
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सीमित हूँ बहुत.....मैं शब्दों में.... अपने ही लेकिन, हूँ विस्तृत बहुत अर्थों में..... मेरे अपने ही... ना होती स्त्री मैं ...
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Monday, 29 January 2018
हो रहे पात पीत
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हो रहे पात पीत सिकुड़ी सी रात रीत ठिठुरन भी गई बीत गा रहे सब बसंत गीत भरी है मादकता तन-मन-उपवन मे. समय होता यहीं व्यतीत ...
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