तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Saturday, 30 June 2012

यादों की हरश्रंगारी महक..................अलका गुप्ता

तन -मन भिगो रही आज ...
यादों की हरश्रंगारी महक ।
अल्हड उन बतियों की चहक ।
ढलकी - ढलकी चितवन ये ।
रूखे अधरों का कंपन ये ।
बिखर गई अलकों में ...
बीते दिनों की राख सी ...
सिमट गई लाली जो ...
झुर्रियों में अनायास ही ...
कसक बहुत रही है आज ।
जो तोड़ ना सके थे कायर हाथ ।
उन बीते दिनों के अनचाहे ...
बंधनों की झूठी लाज ।।


---अलका गुप्ता

Thursday, 28 June 2012

पहचान.............डॉ. सुरेन्द्र मीणा


वो गाँव का पगडंडी,
वो पक्षियों का कलरव,
वो चहलकर करते घर के आँगन में नन्हें-से मेमने...
खुले आसमान में सितारों के बीच,

तन्हा चाँद आज भी उदास-सा है
जब से मैंनें द्खा है उसै गाँव में,
घर के चबूतरे पर खड़े होकर....
गाँव का सोंधी खुशबू का अहसास,
पता नहीं, कहां.. खो-सा गया है?

सब कुछ पीछे छूट सा गया है आज...
गाँव का अहसास दम तोड़ने लगा है अब,
गाँव की पक्की सड़कें...पक्के मकान,
मोबाईल के गगनचुम्बी टॉवर,
मोटरसाइकिलों के धओं से अब,
गांव का पहचान ही बदल-सी गई है आज....।


--डॉ. सुरेन्द्र मीणा (मधुमिता से)