तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Wednesday, 11 January 2012

**ताले **...............मनोज गुप्ता

प्यार किया है मैंने,
उन लोंगो से ,जिनके जीवन में
बाहर निकलने के रास्ते में ,
कहीं न कहीं पड़े है छोटे बड़े ताले !

पास रह के भी नहीं खुलते ,
अपनाने पड़ते हैं टेढ़े मेढ़े रास्ते !
पाप बताते , नरक रचते हैं
ये मन के बेवजह ताले !

सोने चांदी और लोहे ,
के ताले जिनमें बंद हैं ,
खुशियों की खिलखिलाहट
और रौशनी के झरने !

वह अनुभूति की दिव्यता ,
जिसे सर झुका के
हम मान लेते है
स्वीकारोक्ति से भर जाते हैं !

तालों के खुलने से ,
खुल जाती है नई दुनियां ,
सूरज के सामने आ जाते हैं
देखते हैं नई चीजें ,पुराने सरोकारों में !

अंकुरण से फल फूल तक ,
वसंत से पतझड़ तक
समझ में आता है जीवन ,
बहती हुई जीवन सरिता !

पल पल , हर पल
बदलता है जीवन जहाँ ॥
हमने क्यों लगा रखें हैं ,
अनगिनत ताले वहाँ ॥
----मनोज गुप्ता

Tuesday, 10 January 2012

जो जागा...........................गुलाब कोठारी

गलतियों का
पुतला है
आदमी।
भोलेपन में,
प्रवाह में,
आवेश में,
नादानी में,
हो सकती हैं
गलतियां।
क्या जरू री है
हर गलती का
लाभ उठाता रहे
जमाना,
कोई तो मिले
जो रोक सके
हाथों को
गलती करते समय
कोई तो दिखाए रास्ता
जीवन की सच्चाई का।
जब हाथ उठता है
गलती करने को
मन छूट जाता है
पकड़ से
तब वहां
उस माहौल में
कौन मिलेगा मनीषी
खोजता हुआ
अपने ईश्वर को
और, जो जागा,
मनीषी हो जाएगा।
--------गुलाब कोठारी
gulabkothari.wordpress.com

Sunday, 8 January 2012

बेगानों की बेगानी बातें..............सुनन्दा

फासले तुम जो बढ़ाने लगे,
हम खुद के करीब आने लगे.
एक पल न लगा छोड़ कर जानें में,
पास आने में तो जमाने लगे.
एक पल जिन्हें बिताने में उम्र लगी,
गुजर गए वो फसाने लगे.
हिचकी मौत की जो आने लगी,
फिर से जीने के ये बहाने लगे.
तोड़ते रहे दिल कदम-दर कदम,
मुझको वो दोस्त कुछ पुराने लगे.
मुद्दतों दिल में बसाया जिनको,
आज वो ही सबसे बेगाने लगे
------सुनन्दा

Saturday, 7 January 2012

फ़ुज़ूल काम हमारे यहाँ नहीं होते !!....................................मयंक अवस्थी

अगर हवाओं के रुख, मेहरबाँ नहीं होते
तो बुझती आग के तेवर, जवाँ नहीं होते

दिलों पे बर्फ जमीं है, लबों पे सहरा है
कहीं खुलूस के झरने, रवाँ नहीं होते

हम इस ज़मीन को, अश्कों से सब्ज़ करते हैं
ये वो चमन है ,जहाँ बागबाँ नहीं होते

कहाँ नहीं हैं, हमारे भी ख़ैरख्वाह,मगर
जहाँ गुहार लगाओ वहाँ नहीं होते

वफा का ज़िक्र चलाया तो, हंस के बोले वो

फ़ुज़ूल काम हमारे यहाँ नहीं होते !! 
--------मयंक अवस्थी 
प्रस्तुतिकरणः सुरेश पसारी

Saturday, 31 December 2011

आइए श्री बीस बारह आइए...........................अशोक चक्रधर


आइए श्री बीस बारह
आ रहे हैं आइए!

किंतु बारह बाट की


कोई तुला मत लाइए!!

जा रहे श्री बीस ग्यारह,

जा रहे हैं जाइए,

जो हुई हैं भूल

उनको पुन: मत दोहराइए।

आइए कुछ इस तरह

इस देश के जनतंत्र में

जन-मन पनपना

भव्यता का दिव्य सपना

और अपनापन

तनिक बाधित न हो,

संसद भवन के सौध में

जो रखा है

अति जतन से

वह कॉन्स्टीट्यूशन हमारा

सुधर तो जाए मगर

हत्यार्थ सन्धानित न हो।

नालियां जो

इस प्रणाली में बनी हैं,

रुंध गई हैं

ठोस कीचड़ से सनी हैं।

इस सदी ने इस बरस

कुछ शीश

ज्यादा ही धुना है,

वर्ष बारहवां बदलता

रूप घूरे का सुना है।

आइए श्री बीस बारह

आ रहे हैं आइए!

बारामासी खटन गया सी

खट जलवा दिखलाइए!!
--------अशोक चक्रधर

Wednesday, 28 December 2011

अब क़ुरेदो ना इसे राख़ में क्या रखा है ..................कातिल सैफ़ी

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है
इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है

जीत ले जाये कोई मुझको नसीबों वाला
ज़िन्दगी ने मुझे दाँव पे लगा रखा है

जाने कब आये कोई दिल में झाँकने वाला
इस लिये मैंने ग़िरेबाँ को खुला रखा है

इम्तेहाँ और मेरी ज़ब्त का तुम क्या लोगे
मैं ने धड़कन को भी सीने में छुपा रखा है

दिल था एक शोला मगर बीत गये दिन वो क़तील,
अब क़ुरेदो ना इसे राख़ में क्या रखा है 

.......कातिल सैफ़ी

Wednesday, 21 December 2011

चूड़ियों की और खन-खन बढ़ गई...........'अना' क़ासमी

उसको नम्बर देके मेरी और उलझन बढ़ गई
फोन की घंटी बजी और दिल की धड़कन बढ़ गई

इस तरफ़ भी शायरी में कुछ वज़न-सा आ गया
उस तरफ़ भी चूड़ियों की और खन-खन बढ़ गई

हम ग़रीबों के घरों की वुसअतें मत पूछिए
गिर गई दीवार जितनी उतनी आँगन बढ़ गई

मशवरा औरों से लेना इश्क़ में मंहगा पड़ा
चाहतें क्या ख़ाक बढ़तीं और अनबन बढ़ गई

आप तो नाज़ुक इशारे करके बस चलते बने
दिल के शोलों पर इधर तो और छन-छन बढ़ गई
मुनीर भाई

---'अना' क़ासमी
प्रस्तुति करणः मुनीर अहमद मोमिन