तुम देना साथ मेरा

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Tuesday, 20 March 2012

मैं तो चाँद हूँ तन्हा ही रहा..........हेमज्योत्सना 'दीप'

चेहरे बदलने का हुनर मुझमें नहीं,
दर्द दिल में हो तो हँसने का हुनर मुझमें नहीं,


मैं तो आईना हूँ तुझसे, तुझ जैसी ही बात करूँ,
टूट कर सँवरने का हुनर मुझमें नहीं।

चलते-चलते थम जाने का हुनर मुझमें नहीं,
एक बार मिल कर छोड़ जाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो दरिया हूँ, बहता ही रहा,
तूफान से डर जाने का हुनर मुझमें नहीं।

सरहदों में बँट जाने का हुनर मुझमें नहीं,
रोशनी में ना दिख पाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो हवा हूँ महकती ही रही,
आशियाने में रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

दर्द सुनकर और सताने का हुनर मुझमें नहीं,
धर्म के नाम पर खून बहाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो इन्सान हूँ, इन्सान ही रहूँ,
सब कुछ भूल जाने का हुनर मुझमें नहीं।

अपने दम पे जगमगाने का हुनर मुझमें नहीं,
मैं तो रात को ही दिखूँगा,
दिन में दिख पाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो चाँद हूँ तन्हा ही रहा,
तारों की तरह साथ रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

मैं तो जिन्दगी हूँ चलती ही रहूँ,
बेवक्त साथ छोड़ जाने का हुनर मुझमें नहीं।

मैं एक एहसास हूँ, मन में ही बसूँ,
भगवान की तरह पत्थर में रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

-----------हेमज्योत्सना 'दीप'

Saturday, 17 March 2012

मेरे जाने के बाद.............................स्मृति जोशी ''फाल्गुनी''

कुछ मत कहना तुम
मैं जानती हूँ
मेरे जाने के बाद
वह जो तुम्हारी पलकों की कोर पर
रुका हुआ है
चमकीला मोती
टूटकर बिखर जाएगा
गालों पर
और तुम घंटों अपनी खिड़की से
दूर आकाश को निहारोगे
समेटना चाहोगे
पानी के पारदर्शी मोती को,
देर तक बसी रहेगी
तुम्हारी आँखों में
मेरी परेशान छवि
और फिर लिखोगे तुम कोई कविता
फाड़कर फेंक देने के लिए...
जब फेंकोगे उस
उस लिखी-अनलिखी
कविता की पुर्जियाँ,
तब नहीं गिरेगी वह
ऊपर से नीचे जमीन पर
बल्कि गिरेगी
तुम्हारी मन-धरा पर
बनकर काँच की कि‍र्चियाँ...
चुभेगी देर तक तुम्हें
लॉन के गुलमोहर की नर्म पत्तियाँ।
----स्मृति जोशी ''फाल्गुनी''

Thursday, 8 March 2012

अगोरती है आत्मा अगोरती है.............रंजना जायसवाल

प्रेम करना
ईमानदार हो जाना है
यथार्थ से स्वप्न तक ..समष्टि तक
फैल जाना है
त्रिकाल तक
विलीन कर लेना है
त्रिकाल को भी ..प्रेम में.. अपने
जी लेना है अपने
प्रेमालाम्ब में सारी कायनात को पहली बार
प्रेम करना
देखना है खुद को
खोजना है
खुद से
बाहर
मन को छूता है कोई
पहली बार
बज उठती है देह की वीणा
सजग हो उठता है मन –प्राण
चीजों के चर –अचर जीव के ..जन के
मन के करुण स्नेहिल तल तक
छूता है कोई जब पहली बार
सुंदर हो जाती है
हर चीज
आत्मा तक भर उठती है
सुंदरता
अगोरती है आत्मा अगोरती है
देह
देखे कोई नजर
हर पल हमें .
----रंजना जायसवाल

Friday, 2 March 2012

महक उठी थी केसर..........................फाल्गुनी

खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,
महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,
और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,
मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,
तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,
मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।
---------फाल्गुनी

यादों की किरचें ..................................फाल्गुनी

दिल की कोमल धरा पर
धँसी हुई है
तुम्हारी यादों की किरचें
और
रिस रहा है उनसे
बीते वक्त का लहू,
कितना शहद था वह वक्त
जो आज तुम्हारी बेवफाई से
रक्त-सा लग रहा है।
तुम लौटकर आ सकते थे
मगर तुमने चाहा नहीं
मैं आगे बढ़ जाना चाहती थी
मगर ऐसा मुझसे हुआ नहीं।
तुम्हारी यादों की
बहुत बारीक किरचें है
दुखती हैं
पर निकल नहीं पाती
तुमने कहा तो कोशिश भी की।
किरचें दिल से निकलती हैं तो
अँगुलियों में लग जाती है
कहाँ आसान है
इन्हें निकाल पाना
निकल भी गई तो कहाँ जी पाऊँगी
तुम्हारी यादों के बिना।
------फाल्गुनी

Friday, 3 February 2012

हुआ सवेरा .................................निदा फ़ाज़ली

 हुआ सवेरा
ज़मीन पर फिर अदब
से आकाश
अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
नदी में स्नान करने सूरज
सुनारी मलमल की
पगड़ी बाँधे
सड़क किनारे
खड़ा हुआ मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
हवाएँ सर-सब्ज़ डालियों में
दुआओं के गीत गा रही हैं
महकते फूलों की लोरियाँ
सोते रास्तों को जगा रही
घनेरा पीपल,
गली के कोने से हाथ अपने
हिला रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
फ़रिश्ते निकले रोशनी के
हर एक रस्ता चमक रहा है
ये वक़्त वो है
ज़मीं का हर ज़र्रा
माँ के दिल सा धड़क रहा है
पुरानी इक छत पे वक़्त बैठा
कबूतरों को उड़ा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
बच्चे स्कूल जा रहे हैं.....

रचनाकार: निदा फ़ाज़ली

प्रस्तुतिकर्ताः एच. आर.देशमुख

ओ वासंती पवन हमारे घर आना..............डॉ.कुंअर बेचैन

बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।

जडे़ हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल-भरे थे आले सारे कमरों में ।

उलझन और तनावों के रेशों वाले
पूरे हुए थे जाले सारे कमरों में ।

बहुत दिनों के बाद सँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना ।

एक थकन-सी थी नव भाव-तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में

लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक प्यारे-प्यारे रंगों में

बहुत दिनों के बाद खुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना ।

पतझर ही पतझर था मन के मधुवन में
गहरा सन्नाटा सा था अन्तर्मन में

लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर भावों के आँगन में

बहुत दिनों के बाद चिरइयाँ बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।


-----  डॉ.कुंअर बेचैन

Friday, 20 January 2012

चेहरा.....................तरुण पन्त

मैने देखा चिंता और प्यार,
झुर्रियों की तह के पीछे,
डबडबाती हुई आँखों में अजीब सी चमक,
और चेहरे पे एक खोखली सी हँसी,

मैले फटे हाथों की लकीरों को देखती हुई आँखें,
जैसे अब भी कुछ होने का इन्तजार है,
फिर देखती हुई पल्लू में पड़ी एक गांठ को,
जैसे जीवन भर की दस्तान उसमें हो,

कुछ यादों की पनाह में,
जैसे एक जिंदगी चल रही है,
वर्तमान के खांचे में,
अतीत की खिड़की खुल रही है,

कुछ सोचते हुए आँखे भर आई उसकी,
जैसे सिलापट पे बिखरी ओस की कुछ बूंदे हो,
डबडबायी आँखों में अब दर्द है,
और चेहरे पे एक जानी पहचानी सी मुस्कान ...


- तरुण पन्त

Friday, 13 January 2012

आँख मूँद देखा मैंने सूर्य समाया नयनों में आज......डॉ. दीप्ति गुप्ता

एक विलक्षण अनुभूति
सृष्टि नजर आ रही
अनोखी-अनूठी............!
निरभ्र, स्वच्छ, उजला आकाश
सूर्य समाया नयनों में आज....

आज इच्छित, आराधित पूजित,
प्रार्थित पूर्ण जीवन की अभिलाष
सूर्य समाया नयनों में आज....

पुष्प, पल्लव, झरता निर्झर,
पुलकित करता मन को आज
मंद-मंद, सुगन्ध बयार कहता
जीवन परिवर्तित आज
सूर्य समाया नयनों में आज......

कल-कल करता सरिता का जल
कितना चंचल, कितना शीतल
धवल कौमुदी कर सम्मोहित
चहुँ दिशि रचती एक इन्द्रजाल
सूर्य समाया नयनों में आज.....

एक कामना मन में आती
होए भविष्य वर्तमान का साथी
शाश्वत, मधुर, मदिर आभास
पतझड बना बसन्त बहार
सूर्य समाया नयनों में आज.....

तमापूरित, मलिन, अशुचितम
कण-कण लघु जीवन के क्षण
सहसा बने नवल उल्लास
हुआ इन्द्रधनुष सुन्दर साकार
सूर्य समाया नयनों में आज ...

विधि ने रचा स्वर्ग धरती पर
कितना सुन्दर, कितना अभिनव
सार्थक है - ‘तत् त्वमसि’ आज
वृक्षों से झड़ते पुहुप लाज
सूर्य समाया नयनों में आज...

आँख मूँद देखा मैंने
अन्तरतम में मधुर उजास
सत्य, शिव, सुन्दर का बन्धन धोता
कलुष, मिटा अवसाद
सूर्य समाया नयनों में आज...

नहीं चकित होऊँगी
यदि- कहे इसे कोई सपना
सपना ही सही,
लेकिन है तो मेरा अपना !

---डॉ. दीप्ति गुप्ता

चाहा था उन्हें .........अपना बनाना .................दीप्ति शर्मा

कसूर इतना था कि  चाहा था उन्हें

दिल में बसाया था उन्हें कि

मुश्किल में साथ निभायेगें

ऐसा साथी माना था उन्हें |

राहों में मेरे साथ चले जो

दुनिया से जुदा जाना था उन्हें

बिताती हर लम्हा उनके साथ

यूँ करीब पाना चाहा था उन्हें

किस तरह इन आँखों ने

दिल कि सुन सदा के लिए

उस खुदा से माँगा था उन्हें

इसी तरह मैंने खामोश रह

अपना बनाना चाहा था उन्हें |



-  दीप्ति शर्मा

Thursday, 12 January 2012

पीड़ा..........एक मूक रुदन............................चांदी दत्त शुक्ला

तुम्हारा दोस्त दुखी है...
उससे न पूछना, उसकी कातरता की वज़ह,
दुख की गंध सूखी हुई आंख में पड़ी लाल लकीरों में होती है।
ये सवाल न करना, तुम क्यों रोए?
कोई, कभी, ठीक-ठीक नहीं बता सकता अपनी पीड़ा का कारण।
दर्द की कोई भाषा नहीं होती।
कहानियों के ब्योरों में नहीं बयान होते हताशा के अध्याय,
न ही दिल के जख्मों को बार-बार ताज़ा चमड़ी उधेड़कर दिखाना मुमकिन होता है साथी।
कोई कैसे बताएगा कि वह क्यों रोया?
इतना ही क्यों, इस बार ही क्यों, इतनी छोटी-सी वज़ह पर,
ऐसे सवाल उसे चुभते हैं।
मत रो पड़ना उसे हताश देखकर,
वह घिर जाएगा ग्लानि में और उम्र भर के लिए।
नैराश्य होगा ही उसकी ज़ुबान पर और लड़खड़ा जाएगी जीभ,
बहुत उदास और अधीर होगा, अगर उसे सुनानी पड़ी अपनी पीड़ा की कथा।
तब भी यकीन करो, शब्दों में नहीं बांध पाएगा वह अपनी कमज़ोरी।
हो सके तो उसे छूना भी नहीं।
तुम्हारी निगाह में एक भरोसे का भाव है उसका सबसे कारगर मरहम,
उसमें बस लिखा रहे ये कहना – तुम अकेले नहीं हो।
उसकी भीगी पलकों को सूखने का वक्त देना
और ये कभी संभव नहीं होगा, उसे यह समझाते हुए –
गलतियां ये की थीं, इसलिए ऐसा हुआ!
हर दुखी आदमी मन में बांचता है अपने अपराध।
वह जड़ नहीं होता, नहीं तो रोया ही न होता।
दुख नए फैशन का छीटदार बुशर्ट नहीं है कि वह बता सके उसे ओढ़ने की वज़ह,
कोई मौसम भी नहीं आता रुला देने में जो हो कारगर।
हर बार आंख भी नहीं भीग जाती दुख में।
जब कोई खिलखिलाता हुआ चुप हो जाए यकायक,
तब समझना, कहीं गहरे तक गड़ी है एक कील,
जिसे छूने से भी चटख जाएंगी दिल की नसें।
उसके चेहरे पर पीड़ा दिखनी भी जरूरी नहीं है।
एक आहत चुप्पी, रुदन और क्षोभ की त्रासदी की गवाही है।
उसे समझना और मौजूद रहना,
बिना कुछ कहे,
क्योंकि पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती।
------चांदी दत्त शुक्ला

Wednesday, 11 January 2012

मैं रुक गयी होती............................."दीप्ति शर्मा "

जब मैं चली थी तो
तुने रोका नहीं वरना
मैं रुक गयी होती |
यादें साथ थी और
कुछ बातें याद थी 
ख़ुशबू जो आयी होती
तेरे पास आने की तो
मैं रुक गयी होती |
सर पर इल्ज़ाम और
अश्कों का ज़खीरा ले
मुझे जाना तो पड़ा
बेकसूर समझा होता तो
मैं रुक गयी होती |
तेरे गुरुर से पनपी 
इल्तज़ा ले गयी
मुझे तुझसे इतना दूर
उस वक़्त जो तुने 
नज़रें मिलायी होती तो
मैं रुक गयी होती |
खफा थी मैं तुझसे 
या तू ज़ुदा था मुझसे
उन खार भरी राह में
तुने रोका होता तो शायद 
मैं रुक गयी होती |
बस हाथ बढाया होता 
मुझे अपना बनाया होता 
दो घड़ी रुक बातें 
जो की होती तुमने तो 
ठहर जाते ये कदम और 
मैं रुक गयी होती |
------ "दीप्ति शर्मा "

यादें .................आलोक तिवारी


एकाएक बंद हो गई
उन कदमो की आवाज़
आना
हम होते जिनके
अभ्यस्त |

अख़बार यूँ ही
रह जाते बिन
पलटाये
खाली ही रह जाती
वर्ग पहेली |

अलसुबह चाय ले जाते
हुए ठिठक गया
सूनी आराम कुर्सी देखकर
वो , जो मुददतो पहले
चले गए
पर उनकी याद में
आ गए
आँखों में ताजा गर्म आंसू|

चश्मे की गर्माहट
महसूस की थी कई बार
जब तुरंत उतरे चश्मे को
हाथो में लिया था
अब ठण्डा है|

अनायास नाम बदल गया
पता वही है
चिठ्ठियाँ आती है
मेरे नाम से
उनका नाम न होने से
हर बार कुछ और
टूट जाता हूँ मै |

पौधो की रंगत
उड़ चुकी है
बेरंग पौधे में
बेमन से खिले हुए है
कुछ फुल
वो ढूंढ़ते है
उन हाथों की
ऊष्मा |

कमरे से कोई नहीं
देता आवाज
न देर से आने की
वजह पूछता है
चुपचाप गुजर जाता हू मै
अपने कमरे तक |

उम्रदराज लोग
याद करके सुनाते
कुछ अनसुने किस्से
माँ के जाने के बाद
किस कदर टूट चुके थे
मुझको लेकर
फिक्रमंद थे
पिता के दोस्त
जो आखरी कुछ
गवाह है
जिन्होंने देखा
मेरा और पिता का प्रेम
एक दूसरे के प्रति |
--आलोक तिवारी

**ताले **...............मनोज गुप्ता

प्यार किया है मैंने,
उन लोंगो से ,जिनके जीवन में
बाहर निकलने के रास्ते में ,
कहीं न कहीं पड़े है छोटे बड़े ताले !

पास रह के भी नहीं खुलते ,
अपनाने पड़ते हैं टेढ़े मेढ़े रास्ते !
पाप बताते , नरक रचते हैं
ये मन के बेवजह ताले !

सोने चांदी और लोहे ,
के ताले जिनमें बंद हैं ,
खुशियों की खिलखिलाहट
और रौशनी के झरने !

वह अनुभूति की दिव्यता ,
जिसे सर झुका के
हम मान लेते है
स्वीकारोक्ति से भर जाते हैं !

तालों के खुलने से ,
खुल जाती है नई दुनियां ,
सूरज के सामने आ जाते हैं
देखते हैं नई चीजें ,पुराने सरोकारों में !

अंकुरण से फल फूल तक ,
वसंत से पतझड़ तक
समझ में आता है जीवन ,
बहती हुई जीवन सरिता !

पल पल , हर पल
बदलता है जीवन जहाँ ॥
हमने क्यों लगा रखें हैं ,
अनगिनत ताले वहाँ ॥
----मनोज गुप्ता

Tuesday, 10 January 2012

जो जागा...........................गुलाब कोठारी

गलतियों का
पुतला है
आदमी।
भोलेपन में,
प्रवाह में,
आवेश में,
नादानी में,
हो सकती हैं
गलतियां।
क्या जरू री है
हर गलती का
लाभ उठाता रहे
जमाना,
कोई तो मिले
जो रोक सके
हाथों को
गलती करते समय
कोई तो दिखाए रास्ता
जीवन की सच्चाई का।
जब हाथ उठता है
गलती करने को
मन छूट जाता है
पकड़ से
तब वहां
उस माहौल में
कौन मिलेगा मनीषी
खोजता हुआ
अपने ईश्वर को
और, जो जागा,
मनीषी हो जाएगा।
--------गुलाब कोठारी
gulabkothari.wordpress.com

Tuesday, 15 November 2011

दर्द.........................सुमन 'मीत'

... कुछ रोज पहले ही
जिया था मैंने तुझको
अपनी साँसों को कर दिया था
नाम तेरे
मेरा दिल धड़कने लगा था
तेरी ही धड़कनों से
कर ही दिए थे बन्द
सभी दर-ओ-दीवार बेजारी के
बस तेरी ही महक से
कर लिया था सरोबार
वजूद अपना ।

जिस्म से उठती थी
इक खुशबू सौंधी सी
जो करा देती थी
तेरे होने का एहसास
हर बार-हर पल मुझको ।

हुआ यूँ भी
गए रोज ;
तड़पती रही साँसे
तेरी महक के लिए
धड़कनों के लिए
तरसती रहीं धड़कने मेरी
इस बीच
न जाने कब से

आने लगी मौत
दबे पाँव करीब मेरे
बन गए हैं जिस्म पर
कुछ अनचाहे जख्म
रिसने लगी है
कड़वाहट हमारे रिश्ते की
जो कभी घुलती थी
‘सबा’ बन मेरे जिस्म-ओ-जाँ में
अब तो तैरते हैं
आँखों में गम के खारे बादल ।

गम के बादल
घिर-घिर आते हैं
जो बना ही लेते हैं राह
बरसने के लिए
रात की तन्हाई में
और फिर खामोश आँखें
पत्थरा जाती है
झरती हैं रात-रात भर
झरने सरीखी |

सुमन 'मीत'
(आदरणीय ओम पुरोहित कागद जी को समर्पित)

Monday, 14 November 2011

अन्तरात्मा............डॉ. दीप्ति गुप्ता

हम सबके अन्दर एक
निश्छल मानुष रहता है,
मन कपटी नहीं होता उसका,
वह उजला ही रहता है,
कितने ही हम पाप करे,
और दूजे पर दोष मढ़े
पर वह स्वच्छ कमल की भाँति
पंक रहित ही रहता है
अन्याय का पक्ष न लेता,
बात न्याय की कहता है
हम उसको परतों में
अगणित दूर दफन कर देते हैं
करते जाते मन की
अपनी अपनी दुनिया जीते हैं
फिर भी उसकी क्षमता इतनी
दमित तनिक न होती है
बुरे कामों की देख श्रृंखला
हमें ताड़ना देता है
राह दिखाता सीधी – सच्ची
खरी बात ही कहता है
पुण्य पुनीत चन्दा प्यारा सा
हर दम दमका करता है
करे विरोध उसका कितना भी
वह अविचल ही रहता है
ठोकर खाकर गिरने पर
वह थाम हमें झट लेता है
फिर भी हम नहीं सुनते एक
मनमानी करते भरपेट
अन्तरतम में ध्यान मगन
हम पे मुस्काया करता है !!
--डॉ. दीप्ति गुप्ता

Saturday, 12 November 2011

कितना चाहते है मुझे लोग .....मोहन बंजारा

मैं मोहब्बत गर करता हूँ तुमसे ,
इस बात पर क्यूँ अक्सर जल जाते हैं लोग

कोशिशें लाख करें बच नहीं पाते हैं लोग ,
हुस्न की आग से अक्सर पिघल जाते हैं लोग

 हर कोई चाहता है मोहब्बत में जीना ,
जाने क्यूँ फिर वफ़ा निभाना भूल जाते हैं लोग,

दर्द के लम्हात गर कभी पेश-ए-नज़र होते ज़माने वालों को,
जान जाते ये वो भी कि कैसे टूट कर बिखर जाते हैं लोग

तन्हाइयों में जीना मेरी आदत सी बन गयी है,
क्यूँ तन्हा करके मुझे अब कसमसाते हैं लोग

खुशियाँ जो हमसफ़र थी कभी ,ज़माने को बुरी लगती थी,
ग़म का भी गर सहारा है मुझे तो फिर भी आज तिलमिलाते हैं लोग

जाने क्या समझता है ये ज़माना  इस 'बंजारे ' को
छीन कर खुशियाँ मेरी ,ग़म मेरे नाम कर जाते हैं लोग..... बंजारा

Tuesday, 8 November 2011

नजर अपनी अपनी,,,,,,,,,,,,,,,,,,पाराशर गौड़

एक बच्चे की
आँख की रोशनी पल पल जाती रही
कम होती गई
माँ-बाप को हुई चिंता
इसका का क्या होगा ?
गर---इसकी रोशनी चली गई ।
बाप बोला .. .. .. ..
एक काम करें
इसकी आँखों की रोशनी कम होने पहले
क्यों ना, अखबारों में
इशतहार दें ...
"एक बच्चे को आँखें चाहिए
उसे अन्धा होने से बचाएँ ... "
कुछ दिनों के बाद
टेलीफोन खड़के, आवाज आई
मुबारक हो..
आपके बच्चे को आँखें मिल गईं ।
माँ-बाप ने दी दुआ ..
आप्रेशन हुआ
पट्टी खुली, माँ बोली .. ..
"बेटा, कुछ दिखाई दे रहा है
वो, बोला ---- "हाँ"
ये सुनकर सब की बाँछे खिलीं
आवाज आई...
"शुक्र है खुदा का और उसका भी,
जिसकी आँखें इसे मिलीं।"
वो उठा ----,
सब को वहीं छोड़
सामने कुर्सी की ओर दौड़ा
धम्म से जा धस्सा ..
बैठा उसमें होकर चौड़ा
सब एक दूसरे को देखते रहे
इशारों से पूछते रहे ---
ये ऐसा क्यों कर रहा है
ये क्या हो रहा है।
तभी किसने कहा ..,
इसमे इसका कोई दोष नहीं
ये बात, आपकी समझ में नहीं आयेगी
दरसल, इसको जो आँखें मिली हैं, वो
वो, किसी नेता की हैं
वो आप लोगों को थोड़ी देखेंगी
वो -- तो.. .. कुर्सी को देखेंगी।

,,,,,,,,,,,,,पाराशर गौड़

Thursday, 13 October 2011

टूट जाने तलक गिरा मुझको,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,हस्तीमल ’हस्ती’



टूट जाने तलक गिरा मुझको
कैसी मिट्टी का हूँ बता मुझको

मेरी ख़ुशबू भी मर न जाये कहीं
मेरी जड़ से न कर जुदा मुझको

घर मेरे हाथ बाँध देता है
वरना मैदां में देखना मुझको

अक़्ल कोई सज़ा है या इनआम
बारहा सोचना पड़ा मुझको

हुस्न क्या चंद रोज़ साथ रहा
आदतें अपनी दे गया मुझको

देख भगवे लिबास का जादू
सब समझतें हैं पारसा मुझको

कोई मेरा मरज़ तो पहचाने
दर्द क्या और क्या दवा मुझको

मेरी ताकत न जिस जगह पहुँची
उस जगह प्यार ले गया मुझको

ज़िंदगी से नहीं निभा पाया
बस यही एक ग़म रहा मुझको
------हस्तीमल ’हस्ती’