तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा
Showing posts with label एक ज्वलन्त प्रश्न को उठाती कविता. Show all posts
Showing posts with label एक ज्वलन्त प्रश्न को उठाती कविता. Show all posts

Tuesday, 13 December 2011

सिमट गई सूरज के रिश्तेदारों तक ही धूप.....डॉ. जगदीश व्योम


सिमट गई
सूरज के रिश्तेदारों तक ही धूप
न जाने क्या होगा
घर में लगे उकसने काँटे
कौन किसी का क्रंदन बाँटे
अंधियारा है गली गली
गुमनाम हो गई धूप
न जाने क्या होगा
काल चक्र रट रहा ककहरा
गूँगा वाचक, श्रोता बहरा
तौल रहे तुम, बैठ-
तराजू से दुपहर की धूप
न जाने क्या होगा
कंपित सागर डरी दिशाएँ
भटकी भटकी सी प्रतिभाएँ
चली ओढ़ कर अंधकार की
अजब ओढ़नी धूप,
न जाने क्या होगा
घर हैं अपने चील घोंसले
घायल गीत जनम कैसे लें
जीवन की अभिशप्त प्यास
भड़का कर चल दी धूप
न जाने क्या होगा
सहमी सहमी नदी धार है
आँसू टपकाती बहार है
भटके को पथ दिखलाकर, खुद-
भटक गई है धूप
न जाने क्या होगा
स्मृतिमय हर रोम रोम है
एक उपेक्षित शेष व्योम है
क्षितिज अँगुलियों में फँस कर फिर
फिसल गई है धूप
न जाने क्या होगा
बलिदानी रोते हैं जब जब
देख देख अरमानों के शव
मरघट की वादियाँ
खोजने लगीं
सुबह की धूप
न जाने क्या होगा 
--डॉ. जगदीश व्योम