तुम देना साथ मेरा

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Wednesday, 30 January 2019

शब्दों का खेत


'शब्दों के खेत' में
आओ खामोशियों को बोएँ
तितलियों के पंखो को
सपनो की जादुई छड़ी से
सहलाएं....

अंतर्मन की आंखो से

बीते हुए वक्त को सहेजें...
कल-कल करती नदियों से
उसकी सहजता का भेद पूछें....
लोरी की बोलों को बोएं.....

सपनो के सिराहने,

नींद की अठखेलियों से खेलें...
एक नया खेत जोतने की
तैयारी में जुट जाएं.....
आओ, शब्दों के खेत में
खामोशी को फिर से बोएं....
- साजिदा आपा की रचना से प्रेरित

Monday, 29 January 2018

हो रहे पात पीत


हो रहे 
पात पीत
सिकुड़ी सी 
रात रीत
ठिठुरन भी 
गई बीत
गा रहे सब
बसंत गीत
भरी है
मादकता
तन-मन-उपवन मे.
समय होता 
यहीं व्यतीत
बौराया मन
बौरा गया तन
और बौराई
टेसू-पलाश
गीत-गात में 
भर गई प्रीत
-मन की उपज

Sunday, 17 December 2017

फिर अंकुरित हो जाती है

पत्ते झड़ते रहते हैं
शाखाएँ भी कभी
टूट जाती है
पर वृक्ष...
खड़ा रहता है
निर्विकार..निरन्तर
उस पर 
नई शाखाएँ 
आ जाती है
नवपल्लव भी
दिखाई पड़ने लगती है
कुछ जिद्दी लताएँ
साथ ही नही छोड़ती 
वृक्ष का..
रहती है चिपकी
सूखती है और फिर
अंकुरित हो जाती है
-यशोदा
मन की उपज

Wednesday, 22 November 2017

एक स्वप्न नया...


राहें नई..
आयाम नया
हुई विधा नयी
पर कलम वही...

अनुभव नए
शब्द नए
दर्द भी नया
पर कलम वही...


मनन नया
चिन्तन नया
भाव नये
पर कलम वही

दवात नया
कागज नयी
सियाही नयी
पर कलम वही

डायरी नयी
कव्हर नया
पन्ना कोरा
पर कलम वही

एक स्वप्न नया
एक कवि नया
एक कविता नयी
पर कलम वही...

-यशोदा
मन की उपज


Thursday, 9 November 2017

पन्ना एक पलटने के बाद....


भाषा और
ज्ञान के बाद भी
बाकी है बहुत कुछ
ये भाषाएँ
ये ज्ञान की बातें
रहने दीजिए..सीमित
समझता है कौन
आज के इस युग में

इन बातों को...
युग की बात को
युग तक ही रखें...

आज-कल..
इस तरह की भाषा
और ज्ञान भी इसी
तरह का चाहिए..
मसलन..

मौसम मन का
हो जाता है अजीब...
रहता है हरदम...
आवाज के बगैर..
रहता है दर्द 
रिसता है मन का
बुझती सी है
खुशियाँ..
आँगन की...
पन्ना एक पलटने के बाद
आ जाती वापस...
सुगंध एक मादक सी
काफूर हो जाता है
दर्द मन का..

खिल जाते हैं फूल
बिखरता है मकरंद
-यशोदा
मन की उपज





Tuesday, 7 November 2017

भूल-भुलैय्या......


भाषा में 
होता है ज्ञान
और...
अपना ज्ञान भी 

होता है भाषा का
छोटे शब्दों में कहिए तो
भाषा यानि
ज्ञान भी
न मौन है
भाषा
और न ही
ज्ञान मौन है
एक पहचान है
भाषा...
जो अपने आप में
पूर्णता तक ..
पहूँचती है

...
पहुँच है तो
एक मार्ग के साथ
और एक ही भाषा
होती ही नही मार्ग की

मौन होते हैं कई
बोलिया भी है कई

और अंततः
यही होता है
ज्ञान...

-यशोदा
मन की उपज

Sunday, 5 November 2017

ज्ञान की भाषा....मन की उपज



ज्ञान की....भाषा
ज्ञान होता है
और इसे पाएं 
कैसे...
एक प्रश्न है जटिल
....
कहा जाता है
भाषा से होती है
पैदाइश ज्ञान की
ये भी कहते हैं 
भाषा का अपना 
ज्ञान भी होता है ।
छोटे शब्दों में 
भाषा यानी ज्ञान भी ।
....
भाषा न तो 
मौन है
न ही मौन है ज्ञान
एक पहचान है
भाषा..जो
पहुंच रखती है
अपने साथ
पूर्ण रूप से
हमारे मन तक
....
भाषा पहुंच रखती है
एक मार्ग के साथ
और उस मार्ग की
भाषा एक नहीं होती
.........
भाषाएँ रहती है कई
मौन भी
बोलियाँ भी
और..
माने सही तो
इसे ही कहते है ज्ञान
-मन की उपज

Thursday, 2 November 2017

सुख या फिर ख़ुशी......मन की उपज

चुनते हैं हम
सुख या फिर
ख़ुशी..
रह कर भी
शिविर में ..
प्रताड़नाओं के
हम मन के
मौसम को... 
बासन्ती बना सकते हैं
कोई इन्सान..
कोई वस्तु 
या फिर 
प्रक्रिया हो 
कोई भी....
इतनी बलशाली नहीं
कि हमारे मन पर
कब्ज़ा कर सके
वो भी बगैर हमारी 
मर्जी....और हम
मन से..करते हैं 
कोशिश...और
तलाश लेतें हैं
खुशियाँ...
-मन की उपज
#हिन्दी दिवस