तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Saturday, 24 September 2011

मेरा ही कदम पहला हो............ यश चौधरी

मेरा ही कदम पहला हो,
उस जहाँ की तरफ, जिसकी ख्वाहिश मुझमें है

जो ख्वाब उन सूनी आँखों ने देखा ही नहीं,
उसे पूरा करने की गुंजाइश मुझमें है

खुदा को आसमानों में क्यूँ ढूंडा करूँ?
जब उसकी रिहाइश मुझमें है

एक कारवाँ भी साथ हो ही लेगा,
ऐसी अदा-ऐ-गुज़ारिश मुझमें है

खुदगर्ज़ी की लहर में बर्फ हुए जातें हैं सीने,
दिलों के पिघलादे, वो गर्माइश मुझमें है

मेरे ख्वाबों, मेरे अरमानों के लिए औरों को क्यों ताकूँ?
इनकी तामीर की पैदाइश मुझमें है
---यश चौधरी

अश्क़ बन कर जो छलकती रही.........द्विजेन्द्र ‘द्विज’

अश्क़ बन कर जो छलकती रही मिट्टी मेरी
शोले कुछ यूँ भी उगलती रही मिट्टी मेरी

मेरे होने का सबब मुझको बताकर यारो
मेरे सीने में धड़कती रही मिट्टी मेरी

लोकनृत्यों के कई ताल सुहाने बनकर
मेरे पैरों में थिरकती रही मिट्टी मेरी

कुछ तो बाकी था मेरी मिट्टी से रिश्ता मेरा
मेरी मिट्टी को तरसती रही मिट्टी मेरी

दूर परदेस के सहरा में भी शबनम की तरह
मेरी आँखों में चमकती रही मिट्टी मेरी

सिर्फ़ रोटी के लिए दूर वतन से अपने
दर-ब-दर यूँ ही भटकती रही मिट्टी मेरी

मैं जहाँ भी था मेरा साथ न छोड़ा उसने
ज़ेहन में मेरे महकती रही मिट्टी मेरी

कोशिशें जितनी बचाने की उसे कीं मैंने
और उतनी ही दरकती रही मिट्टी मेरी
----------द्विजेन्द्र ‘द्विज’

अजीब अन्दाज़ की ये ज़िन्दगी महसूस होती है.......डॉ. फ़रियाद "आज़र"


अजीब अन्दाज़ की ये ज़िन्दगी महसूस होती है
भली मालूम होती है, बुरी महसूस होती है

ये साँसें भी मुसलसल खुदकुशी का नाम हैं शायद
मैं जितना जीता हूँ, उतनी नफ़ी मह्सूस होती है

जो हाज़िर है कभी उस पर तवज्जो ही नहीं जाती
नहीं जो सामने उसकी कमी महसूस होती है

ज़रा सा गम भी अक्सर साथ देता है मेरा सदियों
खुशी कितनी भी हो क्यों आरिज़ी महसूस होती है

अजीब इन्सां है अब भी ज़िन्दगी के गीत गाता है
मुझे हर साँस उसकी आखिरी मह्सूस होती है

फ़िज़ाओं तक ही गर महदूद रह्ती तो भी जाता
खलाओं में अब आलूदगी महसूस होती है

कभी आया था मेरी ज़िन्दगी में ज़लज़ला ’आज़र’
मुझे अब तक ज़मीं हिलती हुई महसूस होती है
-------डॉ. फ़रियाद "आज़र"

औरतों के जिस्म पर सब मर्द बने हैं.......रवि कुमार


औरतों के जिस्म पर सब मर्द बने हैं
मर्दों की जहाँ बात हो, नामर्द खड़े हैं

शेरों से खेलने को पैदा हुए थे जो
नाज़ुक़ किसी के बदन से वो खेल रहे हैं

हर वक़्त भूखी आँखें कुछ खोज रही हैं
भूखे बेजान जिस्म को भी नोंच रहे हैं

गुल ही पे नहीं आफ़त गुलशन पे है क़यामत
झड़ते हुए फूलों पे, वे कलियों पे पड़े हैं

मरने की नहीं हिम्मत ना जीने का सलीक़ा
हम सूरत – ए - इंसान बेशर्म बड़े हैं
--------------रवि कुमार

गर बेटियों का कत्ल यूँ ही कोख में होता रहेगा.........डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ’अरुण’


गर बेटियों का कत्ल यूँ ही कोख में होता रहेगा!
शर्तिया इन्सान अपनी पहचान भी खोता रहेगा!!

मर जायेंगे अहसास सारे खोखली होगी हँसी,
साँस लेती देह बस ये आदमी ढोता रहेगा!!

स्वर्ग जाने के लिए बेटे की सीढी ढूँढ कर,
नर्क भोगेगा सदा ये आदमी रोता रहेगा!!

ढूँढ लेगा चंद खुशियाँ अपने जीने के लिए,
आदमी बिन बेटियों के मुर्दा बन सोता रहेगा!!

चैन सब खोना पड़ेगा बदनाम होगा आदमी,
बेटियों को मरने का दाग बस धोता रहेगा!!
--डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ’अरुण’

Wednesday, 21 September 2011

जिन्दगी का कसूरवार हूँ ..............यश चौधरी

खुद अपने आप पे मुझको था ऐतबार बहुत
अब अपने आप से रहता हूँ होशियार बहुत

वो जिसने कोई भी वादा नहीं किया मुझसे
उस एक शख्स का रहता है इंतज़ार बहुत

वो खुद तो मेरी पहुँच से निकल गया बाहर
जता रहा है मगर मुझपे इख़्तियार बहुत

शरीक दिल से खुशी में न हो सका मेरी गी
वो लग रहा था मुझे मेरा गमगुसार बहुत

तमाम उम्र तजुर्बों में काट दी मैंने
मैं जिन्दगी का रहा हूँ कसूरवार बहुत

---यश चौधरी

शहनाई-शहनाई है..............यश चौधरी

चाहे जितना कष्ट उठा ले, अच्छाई-अच्छाई है।
खुल जाता है भेद एक दिन, सच्चाई-सच्चाई है।

होती है महसूस जरूरत, जीवन में इक साथी की,
तनहा जीवन कट नहीं सकता,तनहाई-तनहाई है।

पूरे बदन को झटका देना,हाथों को ऊपर करके,
सच पूछो तो तेरी उम्र की, अँगडा़ई-अँगडा़ई है।

भाषा अलग अलग पहनावा,अलग अलग हम रहतें हैं,
लेकिन हम सब हिन्दुस्तानी, भाई-भाई-भाई हैं।

गम़ में खुशी में एक सा रहना,जैसे एक सी रहती है;
सुख-दुख दोनों में बजती है, शहनाई-शहनाई है।
---यश चौधरी