तुम देना साथ मेरा

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Thursday, 19 January 2012

चलो दोस्ती की नई रस्म डालें................देवी नागरानी

बहारों का आया है मौसम सुहाना
नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना।

ये कलियाँ, ये गुंचे ये रंग और ख़ुशबू
सदा ही महकता रहे आशियाना।

हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू
कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना।

चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना।

खुशी बाँटने से बढ़ेगी ज़ियादा
नफ़े का है सौदा इसे मत गँवाना।

मैं देवी ख़ुदा से दुआ माँगती हूँ
बचाना, मुझे चश्मे-बद से बचाना।

---------देवी नागरानी

Saturday, 12 November 2011

अगर हो सके तो .......................अज्ञात

अज्ञात कवि की इस रचना को मेरी मित्र सोनू अग्रवाल ने फेसबुक में पोस्ट किया.............
अगर हो सके तो ...

मुझे अपनी आँखों मैं रखना ,,,

आँसु बन कर बह जाऊ तो ,

हाथो मैं छुपा लेना..!!

अगर हो सके तो ...

मुझे हवाओ मैं बिखेर देना ,,,

तुम्हे छू कर चला जाऊ तो ,

मुझे महसूस कर लेना..!!

अगर हो सके तो ...

मुझे एक फूल समझ लेना,,,

मुरझा भी जाऊ तो ,

किताबो मैं रख लेना..!!

अगर हो सके तो ...

मुझे अपनी खुवाहिश समझ लेना,,

अगर कभी जो मिल न पाऊ तो ,

मुझे अपनी दुआओ मैं रख लेना... !!!

Thursday, 13 October 2011

ठहराव ज़िन्दगी में दुबारा नहीं मिला.............देवी नागरानी


ठहराव ज़िन्दगी में दुबारा नहीं मिला
जिसकी तलाश थी वो किनारा नहीं मिला
वर्ना उतारते न समंदर में कश्तियाँ
तूफ़ान आए जब भी इशारा नहीं मिला
मेरी लड़खड़हाटों ने संभाला है आज तक
अच्छा हुआ किसीका सहारा नहीं मिला
बदनामियाँ घरों मे दबे पाँव आ गई
शोहरत को घर कभी, हमारा नहीं मिला
ख़ुश्बू, हवा और धूप की परछाइयाँ मिलीं
रौशन करे जाए शाम, सितारा नहीं मिला
ख़ामोशियाँ भी दर्द से देवी है चीखती
हम सा कोई नसीब का मारा नहीं मिला 
------देवी नागरानी

Tuesday, 11 October 2011

ओ बंजारे दिल आओ चलें अब घर अपने................ललित कुमार



ओ बंजारे दिल आओ चलें अब घर अपने
घर से दूरी है लगी दिखाने असर अपने
पीछे पड़ी रह जाएगी वो ख़ाक कहेगी
तय हमनें किस तरह किए सफ़र अपने
रहते ग़र वो साथ तो तारे भी क्या दूर थे
पा ही लेते, हमें पर छोड़ गये थे पर अपने
इश्के-साहिल है उसे मिटना तो ही होगा
उठते ही पल गिन लेती लहर लहर अपने
ये तन्हाई भी क्या-क्या खेल दिखाती है
ज़िन्दगी जा रही पर रुके हुए पहर अपने
याद है हम भी कभी खुशहाल हुआ करते थे
फिर ये कि उसने बुलाया मुझे शहर अपने
पूछा नहीं किसी ने जब था हाले-दिल कहना
अब कोई पूछे तो हिलते नहीं अधर अपने
----ललित कुमार

गल्तियाँ सबक हैं............आशा गोस्वामी

ठोकर लगने के अनज़ाने से डर से
बढ़ते कदम यूं नहीं सहमा करते...

और जो थम जायें राह में कहीं
वो नादां मंजिल नहीं चूमा करते..

ठुकराये गए अहसासों की राह में तो क्या
प्यार भरे दिल नफ़रत नहीं बोया करते..

गल्तियाँ सबक हैं..पत्थर की लकीर के माफ़िक
याद रखने वाले इन्हें दोहराया नहीं करते..

चाँद को बेशक़ नाज़ हो नूर पे अपने
बढ़ते-घटते चाँद सा गुमा ये जुगनू नहीं किया करते..!!

-आशा गोस्वामी

Saturday, 1 October 2011

गुच्छा लाल फूलों का........................ललित कुमार

ललित कुमार द्वारा लिखित : 30 सितम्बर 2011
मुझे याद नहीं आता कि पिछली बार मैंने ग़नुक (ग़ज़ल नुमा कविता) कब लिखने की कोशिश की थी। शायद काफ़ी अर्सा हो गया… ख़ैर आज जो लिखा वो ये है…

 
हाले-शहर होता वही जो होता हाल फूलों का
कभी ग़ौर से देखा करो, है कमाल फूलों का

दोनों रखे हैं सामने ज़रा सोच-समझ के बोल
सुर्ख़ खंजर अच्छा कि गुच्छा लाल फूलों का

बड़े जंगजू हुए दिल को मगर नाज़ुक ही रक्खा
आखिर कफ़स में लाया हमें ये जाल फूलों का

याँ बहारे सजती रही अहले-चमन ही गायब थे
बड़ा बेरंग-सा गुज़रा है अबके साल फूलों का

दो गुल ही काफ़ी थे मगर लालच की हद कहाँ
तोड़ क्यूं उसने लिया मुकम्मल डाल फूलों का

-------ललित कुमार 

Thursday, 29 September 2011

दिल के छालों का ज़िक्र आता है................................शरद तैलंग



दिल के छालों का ज़िक्र आता है।
उनकी चालों का ज़िक्र आता है।

प्यार अब बाँटने की चीज़ नहीं,
शूल भालों का ज़िक्र आता है।

सूर मीरा कबीर मिलते नहीं,
बस रिसालों का ज़िक्र आता है।

लोग जब हक़ की बात करते हैं,
बंद तालों का ज़िक्र आता है।

आग जब दिल में उठने लगती है
तब मशालों का ज़िक्र आता है।

जल के मिट तो रहे हैं परवाने,
पर उजालों का ज़िक्र आता है।

देखकर हाल अब ज़माने का,
गुज़रे सालों का ज़िक्र आता है।
......शरद तैलंग 

Saturday, 24 September 2011

मेरा ही कदम पहला हो............ यश चौधरी

मेरा ही कदम पहला हो,
उस जहाँ की तरफ, जिसकी ख्वाहिश मुझमें है

जो ख्वाब उन सूनी आँखों ने देखा ही नहीं,
उसे पूरा करने की गुंजाइश मुझमें है

खुदा को आसमानों में क्यूँ ढूंडा करूँ?
जब उसकी रिहाइश मुझमें है

एक कारवाँ भी साथ हो ही लेगा,
ऐसी अदा-ऐ-गुज़ारिश मुझमें है

खुदगर्ज़ी की लहर में बर्फ हुए जातें हैं सीने,
दिलों के पिघलादे, वो गर्माइश मुझमें है

मेरे ख्वाबों, मेरे अरमानों के लिए औरों को क्यों ताकूँ?
इनकी तामीर की पैदाइश मुझमें है
---यश चौधरी

औरतों के जिस्म पर सब मर्द बने हैं.......रवि कुमार


औरतों के जिस्म पर सब मर्द बने हैं
मर्दों की जहाँ बात हो, नामर्द खड़े हैं

शेरों से खेलने को पैदा हुए थे जो
नाज़ुक़ किसी के बदन से वो खेल रहे हैं

हर वक़्त भूखी आँखें कुछ खोज रही हैं
भूखे बेजान जिस्म को भी नोंच रहे हैं

गुल ही पे नहीं आफ़त गुलशन पे है क़यामत
झड़ते हुए फूलों पे, वे कलियों पे पड़े हैं

मरने की नहीं हिम्मत ना जीने का सलीक़ा
हम सूरत – ए - इंसान बेशर्म बड़े हैं
--------------रवि कुमार

गर बेटियों का कत्ल यूँ ही कोख में होता रहेगा.........डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ’अरुण’


गर बेटियों का कत्ल यूँ ही कोख में होता रहेगा!
शर्तिया इन्सान अपनी पहचान भी खोता रहेगा!!

मर जायेंगे अहसास सारे खोखली होगी हँसी,
साँस लेती देह बस ये आदमी ढोता रहेगा!!

स्वर्ग जाने के लिए बेटे की सीढी ढूँढ कर,
नर्क भोगेगा सदा ये आदमी रोता रहेगा!!

ढूँढ लेगा चंद खुशियाँ अपने जीने के लिए,
आदमी बिन बेटियों के मुर्दा बन सोता रहेगा!!

चैन सब खोना पड़ेगा बदनाम होगा आदमी,
बेटियों को मरने का दाग बस धोता रहेगा!!
--डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ’अरुण’

Wednesday, 21 September 2011

तब याद आया..................................सचिन

तब याद आया हमको कि चोटों ने क्या दिया
इन पत्थरों ने जब हमे चलना सिखा दिया

छोटी सी जिद पे बच्चे कि आँखे जो नम हुई
थाली में चाँद माँ ने ज़मीं पर ही ला दिया

आँखों ने जब भी की है नयी रौशनी की जिद
हमने भी एक चिराग जलाया बुझा दिया

ये सुनके मेरी बेटियाँ सहमी हुई हैं आज
फिर से रसोई में कोई जिंदा जला दिया

खुद शर्म आई फिर हमे अपने रुसूख पर
सिक्के को जब फ़कीर ने मिटटी बना दिया......

-सचिन अग्रवाल 'तन्हा'